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शांता कुमार बोले– सत्ता जाती है तो चली जाए, लेकिन सत्य नहीं, राजनीति के अनुभव साझा किए

Written by:Neha Sharma
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भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने कहा है कि उनके लिए सत्ता से ज्यादा सत्य महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, “सत्ता जाती है तो चली जाए, लेकिन सत्य नहीं जाना चाहिए। 60 साल से राजनीति में हूं और आज की गिरती राजनीति के बावजूद मेरा जीवन एक जीवंत दस्तावेज है।”
शांता कुमार बोले– सत्ता जाती है तो चली जाए, लेकिन सत्य नहीं, राजनीति के अनुभव साझा किए

भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री शांता कुमार ने कहा है कि उनके लिए सत्ता से ज्यादा सत्य महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा, “सत्ता जाती है तो चली जाए, लेकिन सत्य नहीं जाना चाहिए। 60 साल से राजनीति में हूं और आज की गिरती राजनीति के बावजूद मेरा जीवन एक जीवंत दस्तावेज है। मेरे जीवन की गाथा हिंदी और अंग्रेजी में आ चुकी है, अब जल्द ही पंजाबी में भी प्रकाशित होगी। राजनीति में मेरी अवधि भले ही कम रही हो, लेकिन उपलब्धियां कहीं अधिक हैं।”

पालमपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान शांता कुमार ने भारतीय जनता पार्टी और देश की मौजूदा स्थिति पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज देश और भाजपा का स्वर्णिम युग चल रहा है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हो चुका है, जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हट चुकी है और राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा सबसे मजबूत स्थिति में है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपराजेय नेता बताया और कहा कि इस स्वर्णिम युग के पीछे सबसे बड़ी भूमिका राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की रही है, क्योंकि कई मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री आरएसएस से निकले हैं। कांग्रेस के वोट चोरी आंदोलन को उन्होंने महज एक “राजनीतिक ड्रामा” बताया।

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने अनुभव साझा किए

अपने राजनीतिक जीवन को याद करते हुए शांता कुमार ने कहा कि वह 19 महीने नाहन जेल में रहे, जहां उन्होंने स्वामी विवेकानंद की किताबें पढ़ीं। इन पुस्तकों ने उनकी जिंदगी बदल दी और उन्हें अंत्योदय की प्रेरणा मिली। उन्होंने कहा कि अगर वह जेल नहीं गए होते तो आज उनकी सोच और कार्यशैली अलग होती। शांता कुमार ने बताया कि हिमाचल प्रदेश में जल शक्ति विभाग का गठन भी उनके कार्यकाल में हुआ था।

अंत्योदय योजना की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जब वह एनडीए सरकार में खाद्य मंत्री बने तो उन्होंने देखा कि देश में अनाज के ढेर पड़े हैं, लेकिन पांच करोड़ लोग भूखे सोते हैं। इस स्थिति को देखते हुए उन्होंने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से अंत्योदय योजना शुरू करने की मांग की थी। हालांकि तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा इस योजना के खिलाफ थे और उनसे नाराज भी हो गए थे। इसके बावजूद वाजपेयी ने 25 दिसंबर 2000 को अपने जन्मदिन पर प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के साथ अंत्योदय योजना की भी शुरुआत की।

शांता कुमार ने अपने जीवन का एक रोचक प्रसंग साझा किया। उन्होंने बताया कि 1977 में जब वह मुख्यमंत्री बने और थोड़े समय बाद सत्ता से बाहर हो गए, तो वह शिमला के एक थिएटर में फिल्म देखने चले गए थे। उस समय लोग उन्हें देखकर चकित रह गए थे कि सत्ता खोने के बाद भी वह इतने सहज हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति उनके लिए सेवा का माध्यम रही है, न कि केवल सत्ता हासिल करने का साधन।

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