हिंदू धर्म में गोवर्धन पूजा का बहुत महत्व है। ये त्योहार कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को या यूं कहे कि दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है। गोवर्धन पूजा का पर्व भारतीय संस्कृति और धार्मिक आस्था का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है। इसे अन्नकूट उत्सव के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन महिलाएं गोबर का भगवान बनाकर उसकी भली प्रकार से पूजा करती हैं। और संध्या समय अन्नादि का भोग लगाकर दीपदान करती हुई परिक्रमा करती हैं। इस दिन नीवन अन्न का भोजन बनाकर भगवान का 56 भोग का प्रसाद चढ़ाया जाता है। कई महिलाएं इस दिन व्रत भी रखती हैं।
आज होगी भगवान गोवर्धन की पूजा
इस साल दो अमावस्या पड़ने के कारण कुछ लोग 22 अक्टूबर गोवार्धन पूजा का त्योहार मना रहे हैं। हालांकि कुछ लोगोंं ने 21 अक्टूबर को भी गोवर्धन पूजा कर ली है लेकिन मान्य कौन सी है चलिए हम बताते हैं। शास्त्रों के अनुसार गोवर्धन पूजन कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाई जाती है। प्रतिपदा तिथि की शुरुआत 21 अक्टूबर की शाम को हो रही है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक कोई भी पर्व उदया तिथि में मनाया जाता है। ऐसे में प्रतिपदा 22 अक्टूबर को मान्य रहने वाली है।
गोवर्धन पूजा का शुभ मुहूर्त
गोवर्धन पूजा की बात करें तो दो शुभ मुहूर्त हैं। पहला शुभ मुहूर्त सुबह 6:26 से 8:42 तक रहेगा। पूजन की अवधि एक घंटा 16 मिनट की है। वहीं अगर आपको शाम के समय पूजन करनी है तो दूसरा मुहूर्त दोपहर 3:29 से शाम 5:44 तक शुभ है। यह अवधि 2 घंटा 16 मिनट की है।
गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा
गोवर्धन पूजा द्वापर युग की भगवान श्रीकृष्ण की एक एक अद्भुत लीला है। इसका जिक्र हमारे वेद पुराणों में तक है। भागवत महापुराण में इस कथा का विस्तार से वर्णन किया गया है। चलिए हम इस कथा के बारे में संक्षिप्त में बात करते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, द्वापर युग में ब्रजवासी प्रतिवर्ष देवराज इंद्र की पूजा करते थे, ताकि वे वर्षा करें और उनकी खेती और व्यापार अच्छ हो। एक बार भगवान श्रीकृष्ण ने यह प्रथा देखी और अपनी माता यशोदा से पूछा कि यह पूजा क्यों की जा रही है। माता यशोदा ने उन्हें इंद्र देव की महत्ता बताई और कहा कि हम से सुखी रहे इसलिए इंद्रदेव की पूजा करते हैं।
तब श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को समझाया कि वे इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत की पूजा करें, क्योंकि वही उनके पशुओं और जीवनयापन का आधार है। गोवर्धन उन्हें घास, जड़ी-बूटियाँ और जल प्रदान करते हैं। श्रीकृष्ण की बात मानकर ब्रजवासियों ने गोवर्धन पर्वत की पूजा शुरू कर दी। इससे क्रोधित होकर इंद्र देव ने गोकुल में भयंकर वर्षा शुरू कर दी, जिससे पूरे ब्रज में हाहाकार मच गया। ब्रजवासियों को डूबते देख, भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा (छोटी) उंगली पर पूरे गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और सभी ब्रजवासियों तथा पशुओं को उसके नीचे आश्रय दिया।
सात दिन तक इंद्र ने वर्षा की लेकिन वे श्रीकृष्ण की शक्ति और उनकी लीला को समक्ष नहीं पाए। अंत में इंद्र को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने हार मानकर वर्षा रोक दी। तब से यह पर्व गोवर्धन पर्वत और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है और महिलाएं नए अनाज का प्रसाद बनाकर भगवान को अर्पित करती हैं।





