अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने 52 साल बाद पहली बार इंसानों को चंद्रमा के करीब भेजने के लिए सोमवार 2 अप्रैल को अपना ‘आर्टेमिस-2’ मिशन सफलतापूर्वक लॉन्च किया है। दरअसल फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से सुबह 4:05 बजे ‘स्पेस लॉन्च सिस्टम’ (SLS) रॉकेट ने ओरियन स्पेसक्राफ्ट में सवार चार अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर चांद की ओर उड़ान भरी है। यह लॉन्चिंग पृथ्वी से चंद्रमा तक इंसानी सफर के एक नए दौर की शुरुआत मानी जा रही है। साल 1972 में ‘अपोलो-17’ के बाद यह पहला मौका है जब कोई इंसान पृथ्वी की निचली कक्षा (LEO) से आगे बढ़कर चंद्रमा के इतने करीब पहुंच रहा है। यह मिशन कुल 10 दिनों का है, जिसमें चारों अंतरिक्ष यात्री चांद के चारों ओर चक्कर लगाएंगे और फिर सुरक्षित तरीके से धरती पर लौटेंगे।
दरअसल लॉन्च से ठीक एक घंटा पहले एक तकनीकी समस्या ने कुछ देर के लिए सबकी चिंता बढ़ा दी थी। रॉकेट के ‘लॉन्च अबॉर्ट सिस्टम’ में कुछ गड़बड़ी आ गई थी, जिससे लॉन्चिंग पर खतरा बन गया था। यह सिस्टम बहुत अहम होता है, क्योंकि किसी भी खराबी की स्थिति में यह अंतरिक्ष यात्रियों को रॉकेट से सुरक्षित बाहर निकालने में मदद करता है। हालांकि इंजीनियरों ने इस समस्या को तेजी से ठीक कर लिया। इसके बाद सुरक्षा जांच के लिए काउंटडाउन घड़ी को एहतियातन 10 मिनट के लिए रोक दिया गया। रॉकेट के अलग-अलग जरूरी सिस्टम्स संभाल रहे इंजीनियरों की ‘ओके’ रिपोर्ट मिलने के बाद ही मिशन को आगे बढ़ने की मंजूरी दी गई।
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ओरियन स्पेसक्राफ्ट अंतरिक्ष की ओर रवाना हो गया
वहीं अंतिम समय में मिशन के क्रू को लॉन्च डायरेक्टर से उत्साह भरा संदेश मिला, “आर्टेमिस II, मैं लॉन्च डायरेक्टर बोल रहा हूं, आप उड़ान के लिए तैयार हैं।” इस ऐतिहासिक घोषणा पर मिशन कमांडर रीड वाइजमैन ने पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब दिया, “हम पूरी मानवता की खातिर जा रहे हैं।” इस संवाद के तुरंत बाद चार RS-25 इंजन और दो सॉलिड रॉकेट बूस्टर पूरी ताकत के साथ चालू हो गए और ओरियन स्पेसक्राफ्ट अपने चार अंतरिक्ष यात्रियों को लेकर अंतरिक्ष की ओर रवाना हो गया। यह पल अंतरिक्ष इतिहास में एक नए मील के पत्थर के रूप में दर्ज हो गया है।
मुख्य मकसद ओरियन स्पेसक्राफ्ट के ‘लाइफ सपोर्ट सिस्टम’ की गहराई से जांच करना
इस आर्टेमिस-2 मिशन का मुख्य मकसद ओरियन स्पेसक्राफ्ट के ‘लाइफ सपोर्ट सिस्टम’ की गहराई से जांच करना है। नासा यह देखना चाहता है कि अंतरिक्ष में इंसानों के लंबे समय तक रहने और काम करने के लिए यह यान कितना सुरक्षित और भरोसेमंद है। यह यान अभी चंद्रमा की सतह पर नहीं उतरेगा, लेकिन इसका सफल परीक्षण भविष्य में चंद्रमा पर इंसानों के स्थायी रूप से रहने का रास्ता आसान बनाएगा। यह मिशन इंसानों को चंद्रमा के आसपास रहने और काम करने का अनुभव देगा, जो आगे चलकर मंगल ग्रह पर मानव मिशन भेजने की नासा की बड़ी योजना का अहम हिस्सा है।
आर्टेमिस-2 में चार अनुभवी अंतरिक्ष यात्री, पहली महिला और गैर-अमेरिकी भी शामिल
आर्टेमिस-2 मिशन में नासा के तीन और कनाडाई स्पेस एजेंसी (CSA) का एक अंतरिक्ष यात्री शामिल है। ये चारों अनुभवी अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष अन्वेषण के एक नए दौर की शुरुआत कर रहे हैं, जिनमें कई ऐतिहासिक उपलब्धियां भी जुड़ी हैं।
रीड वाइजमैन (50): यूएस नेवी के टेस्ट पायलट रह चुके वाइजमैन इस मिशन के कमांडर हैं। उन्होंने 2014 में अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर छह महीने बिताए थे, जहां उन्होंने कई अहम वैज्ञानिक प्रयोग और तकनीकी काम किए थे। दिलचस्प बात यह है कि वाइजमैन को जमीन पर ऊंचाई से डर लगता है। 2020 में अपनी पत्नी को खोने के बाद वे अपनी दो बेटियों की अकेले परवरिश कर रहे हैं, जो उनकी मजबूत इच्छाशक्ति को दिखाता है।
क्रिस्टीना कोच (47): इंजीनियर और फिजिसिस्ट क्रिस्टीना कोच मिशन स्पेशलिस्ट हैं। वह अंतरिक्ष में सबसे लंबे समय तक रहने वाली महिला (328 दिन) का रिकॉर्ड बना चुकी हैं। क्रिस्टीना चांद के करीब पहुंचने वाली पहली महिला होंगी, जो लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। उन्होंने बचपन में अपोलो-8 की खींची गई ‘अर्थराइज’ फोटो देखकर ही अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना देखा था।
जेरेमी हैनसन (50): कनाडा के पूर्व फाइटर पायलट जेरेमी हैनसन भी मिशन स्पेशलिस्ट हैं और कनाडाई स्पेस एजेंसी का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। अगर यह मिशन योजना के अनुसार सफल रहता है, तो हैनसन चांद के करीब पहुंचने वाले पहले गैर-अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री बन जाएंगे। हैनसन अपने साथ कनाडा का मशहूर मैपल सिरप और कुछ कुकीज भी ले गए हैं, जो उनकी संस्कृति का प्रतीक हैं।
विक्टर ग्लोवर (49): मिशन के पायलट विक्टर ग्लोवर चांद के करीब पहुंचने वाले पहले अश्वेत व्यक्ति होंगे। यह अंतरिक्ष यात्रा में विविधता और समावेशिता को बढ़ावा देने वाला कदम माना जा रहा है। ग्लोवर अपने साथ बाइबिल और अपनी शादी की अंगूठियां ले गए हैं, जो उनके निजी विश्वास और मूल्यों को दिखाती हैं। वे अक्सर कहते हैं कि ब्रह्मांड में अपनी जगह को समझना ही इंसान होने का असली मतलब है।
आर्टेमिस-2 की सफलता के बाद नासा अपने अगले बड़े कदम ‘आर्टेमिस-3’ मिशन पर काम करेगा। इस मिशन में डॉकिंग सिस्टम की टेस्टिंग की जाएगी, जो भविष्य में चंद्रमा पर लैंडिंग और अंतरिक्ष स्टेशन बनाने के लिए जरूरी है। अगर सभी मिशन सफल रहते हैं, तो नासा की योजना है कि साल 2028 में ‘आर्टेमिस-4’ के जरिए इंसान एक बार फिर चंद्रमा की सतह पर कदम रखेगा। इससे पहले 2022 में नासा ने मानवरहित ‘आर्टेमिस-1’ मिशन सफलतापूर्वक भेजा था, जिसमें ओरियन कैप्सूल और SLS रॉकेट की क्षमता का परीक्षण किया गया था।