अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के कार्यकाल में लगाए गए अरबों डॉलर के वैश्विक टैरिफ की वैधता पर अपना फैसला टाल दिया है। इस मामले पर अगली सुनवाई की तारीख जल्द ही तय की जाएगी, जिससे वैश्विक व्यापार और अमेरिकी अर्थव्यवस्था से जुड़ी अनिश्चितता बढ़ गई है। यह मामला न केवल टैरिफ के भविष्य, बल्कि इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्तियों की सीमा को भी परिभाषित करेगा।
इससे पहले 9 जनवरी को फैसला आने की उम्मीद थी, लेकिन अदालत ने इसे स्थगित कर दिया। ट्रम्प ने चेतावनी दी थी कि अगर फैसला उनके खिलाफ आया तो देश को गंभीर आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं और टैरिफ से वसूले गए अरबों डॉलर लौटाने पड़ सकते हैं, जिससे देश “बर्बाद हो जाएगा”।
क्या है पूरा विवाद?
अप्रैल 2025 में, तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रम्प ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए कई देशों से आयात होने वाले स्टील और एल्युमीनियम जैसे सामानों पर भारी टैरिफ लगा दिए थे। इसके लिए उन्होंने 1977 में बने इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का इस्तेमाल किया। यह कानून राष्ट्रपति को युद्ध या किसी असाधारण राष्ट्रीय संकट की स्थिति में विदेशी लेनदेन को नियंत्रित करने की शक्ति देता है। ट्रम्प प्रशासन ने दलील दी थी कि व्यापार घाटा भी एक तरह का राष्ट्रीय आपातकाल है, जिससे देश की आर्थिक सुरक्षा को खतरा है।
राष्ट्रपति की शक्तियां दांव पर
यह मामला अब केवल टैरिफ तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह अमेरिकी राष्ट्रपति की शक्तियों की संवैधानिक सीमा तय करने वाला बन गया है। सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि क्या IEEPA कानून राष्ट्रपति को कांग्रेस (अमेरिकी संसद) की मंजूरी के बिना इतने बड़े पैमाने पर और अनिश्चित काल के लिए टैरिफ लगाने का एकतरफा अधिकार देता है। आलोचकों का तर्क है कि टैरिफ एक प्रकार का टैक्स है और टैक्स लगाने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है।
फैसले का क्या होगा असर?
अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ट्रम्प के पक्ष में आता है, तो यह स्थापित हो जाएगा कि अमेरिकी राष्ट्रपति राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर वैश्विक व्यापार पर बड़े फैसले ले सकता है। इससे भविष्य के राष्ट्रपतियों के लिए भी बिना संसदीय मंजूरी के टैरिफ जैसे कदम उठाने का रास्ता खुल जाएगा। वहीं, अगर फैसला ट्रम्प के खिलाफ जाता है, तो न केवल मौजूदा टैरिफ रद्द हो जाएंगे, बल्कि कंपनियों को अरबों डॉलर का रिफंड भी देना पड़ सकता है। इससे भारत, चीन और यूरोपीय संघ के निर्यातकों को बड़ी राहत मिलेगी और वैश्विक व्यापार में स्थिरता आ सकती है।
निचली अदालतों में हार चुकी है सरकार
ट्रम्प के इस फैसले के खिलाफ अमेरिका के 12 राज्यों और कई छोटे कारोबारियों ने मुकदमा दायर किया था। उनका कहना था कि राष्ट्रपति ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर यह कदम उठाया है। इससे पहले, कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल ट्रेड और फेडरल सर्किट कोर्ट जैसी निचली अदालतें इन टैरिफ को गैर-कानूनी ठहरा चुकी हैं। नवंबर 2025 में मौखिक सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट के जजों ने इस पर संदेह जताया था कि क्या राष्ट्रपति को इतना व्यापक अधिकार दिया जा सकता है।





