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जंक फूड बन चुके मोमोज़ की असली कहानी: स्टीम से गर्म तेल तक, स्वाद के सफर में कैसे खो गई सेहत

Written by:Shruty Kushwaha
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भारत का स्ट्रीट-फूड बन चुका मोमोज़ तिब्बत में रोजमर्रा का खाना ही नहीं, उत्सव और खास अवसर का हिस्सा भी है। तिब्बती नव वर्ष के दौरान वहां परिवार मिलकर मोमोज़ बनाते हैं। कुछ पश्चिमी देशों में मोमोज़ को "हिप्स्टर" फूड के रूप में देखा जा रहा है, जहां इसे वीगन फिलिंग्स और आधुनिक ट्विस्ट के साथ परोसा जाता है। कुछ जगहों पर स्वीट डिश के रूप में चॉकलेट या मीठी फिलिंग वाले मोमोज़ भी बनाए जाते हैं।
जंक फूड बन चुके मोमोज़ की असली कहानी: स्टीम से गर्म तेल तक, स्वाद के सफर में कैसे खो गई सेहत

साभार: गूगल

सड़क किनारे गर्मागर्म मोमोज़ की रेहड़ी हो या रेस्तरां में स्टाइलिश प्लेट में सजा मोमोज़..ये चटपटा व्यंजन आज हर गली-नुक्कड़ का चहेता बन चुका है। हमारे यहां कुछ ही सालों में ये एक बेहद पॉपुलर फास्ट फूड बन गया है। क्या आप जानते हैं कि यह स्वादिष्ट स्नैक जिसे लोग अक्सर अनहेल्दी मान लेते हैं, असल में तिब्बत का पारंपरिक व्यंजन है जो अपने मूल रूप में काफी सेहतमंद होता है।

हमारे यहां मोमोज़ का जो ‘देसी वर्जन’ तैयार हुआ है, वह तिब्बती सादगी से कोसों दूर है। मूल रूप से हल्के, स्टीम्ड और सुपाच्य रहे मोमोज़ को भारतीय बाजार में इतना ज्यादा ‘जंक फूड’ बना दिया गया है कि वह स्वाद के नाम पर सेहत को सीधी चुनौती देने लगा है। हमारे यहां अक्सर मोमोज़ में भर-भरकर प्रोसेस्ड चीज़ डाली जाती है। तिब्बती भाप वाले मोमोज़ भारत में बटर लपेटकर तंदूरी ओवन में डाल दिए गए या तेल में तला जाने लगा है। इस तरह हमने इसके मूल रूप को ही नष्ट कर दिया है। आइए जानते हैं मोमोज़ की असली कहानी क्या है और ये असल में स्वास्थ्य के लिए कैसे फायदेमंद हो सकता है।

मोमोज़ की जड़ें: तिब्बत से नेपाल तक

मोमोज़ की उत्पत्ति तिब्बत में हुई। एक अनुमान के मुताबिक वहां इसे 14वीं सदी से खाया जा रहा है। यह तिब्बती व्यंजन बाद में नेपाल, भूटान और भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों जैसे सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और दार्जिलिंग में लोकप्रिय हुआ। तिब्बती भाषा में “मोमो” शब्द का अर्थ है “भाप में पकाया गया व्यंजन”। यह एक तरह का डंपलिंग है जो तिब्बती और नेपाली संस्कृति में उत्सवों और पारिवारिक समारोहों का हिस्सा रहा है।

मोमोज़ को तिब्बत से नेपाल लाने का श्रेय Newar व्यापारियों को जाता है जो प्राचीन व्यापार मार्गों के जरिए इसे भारत और अन्य पड़ोसी देशों में ले गए। आज यह व्यंजन इतना लोकप्रिय है कि इसे कोरिया के mandu, जापान के gyoza और चीन के jiaozi जैसे डंपलिंग्स के साथ जोड़ा जाता है। लेकिन मोमोज़ का देसी स्वाद इसे सबसे खास बनाता है!

मूल तिब्बती मोमोज़: स्वाद के साथ सेहत भी

तिब्बती मोमोज़ अपनी सादगी और ताजगी के लिए मशहूर हैं। इन्हें बनाने की प्रक्रिया बेहद सरल लेकिन स्वाद से भरपूर है। साथ ही ये अपनी सामग्री और बनाने के तरीके के कारण बहुत हेल्दी भी होते हैं। आइए, जानते हैं कि मूल रूप से मोमोज़ कैसे बनाए जाते हैं:

सामग्री:
आटा: गेहूं का आटा या मैदा, पानी से गूंथा हुआ।
फिलिंग: पारंपरिक रूप से याक का कीमा (अब आमतौर पर चिकन, पोर्क, मटन या सब्जियां जैसे गोभी, गाजर और हरा प्याज)।
मसाले: नमक, काली मिर्च, अदरक, लहसुन और कभी-कभी स्थानीय जड़ी-बूटियां।
चटनी: तिब्बती स्टाइल में तीखी टमाटर-मिर्च की चटनी, जिसे “सेपेन” कहा जाता है।

विधि:
आटा तैयार करना: गेहूं के आटे को पानी के साथ गूंथकर नरम लोई बनाई जाती है। इसे पतला बेलकर छोटे-छोटे गोले काटे जाते हैं।
फिलिंग तैयार करना: कीमा या बारीक कटी सब्जियों को अदरक, लहसुन, नमक और काली मिर्च के साथ मिलाया जाता है। तिब्बती मोमोज़ में ज्यादा तेल या भारी मसालों का उपयोग नहीं होता।
मोमोज़ बनाना: आटे के गोले में फिलिंग भरकर इन्हें चांद जैसी गोल या अर्धचंद्राकार आकृति में मोड़ा जाता है।
पकाना: मोमोज़ को बांस के स्टीमर में भाप में पकाया जाता है, जिससे यह हल्का और पौष्टिक रहता है। कुछ जगहों पर इन्हें तलकर या पानी में उबालकर भी बनाया जाता है।
इसी के साथ स्थानीय स्वाद के अनुसार चटनी या सॉस बनाया जाता है, जिसमें स्वास्थ्यवर्धक सब्जियां और मसाले होते हैं।

मोमोज़: स्वास्थ्य के लिए हानिकारक या सेहतमंद

भारत में मोमोज़ को अक्सर अनहेल्दी स्नैक माना जाता है, क्योंकि सड़क पर बिकने वाले मोमोज़ में मैदा, ज्यादा तेल, ढेर सारा प्रोसेस्ट चीज़ और अजीनोमोटो इस्तेमाल होता है। लेकिन मूल तिब्बती मोमोज़ स्वास्थ्य के लिए कई मायनों में फायदेमंद हो सकते हैं। भाप में पकाए गए मोमोज़ में तेल का उपयोग न के बराबर होता है, जिससे यह कम कैलोरी वाला व्यंजन बनता है। सब्जी वाले मोमोज़ में गोभी, गाजर, पालक और मशरूम जैसे पोषक तत्वों से भरपूर इंग्रेडिएंट्स होते हैं, जो फाइबर, विटामिन और मिनरल्स प्रदान करते हैं। चिकन या याक के कीमे से बने मोमोज़ प्रोटीन से भरपूर होते हैं, जो मांसपेशियों और ऊर्जा के लिए जरूरी है। तिब्बती मोमोज़ में हल्के मसाले और ताजी जड़ी-बूटियों का उपयोग होता है, जो पाचन के लिए अच्छे होते हैं। अगर आपको मोमोज़ पसंद है तो बेहतर होगा कि बाहर खाने की बजाय घर पर ही इसे हेल्दी सामग्री के साथ सही तरीके से बनाएं।

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Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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