भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने उपराष्ट्रपति पद के चुनाव के लिए सी. पी. राधाकृष्णन को उम्मीदवार बनाया है। जगदीप धनखड़ के अचानक इस्तीफे के कारण यह चुनाव हो रहा है। भाजपा ने इस चुनाव को विपक्षी दलों की एकजुटता तोड़ने के अवसर के रूप में इस्तेमाल करने की रणनीति अपनाई है। राधाकृष्णन के नाम की घोषणा के साथ ही महाराष्ट्र के दो प्रमुख क्षेत्रीय दलों को कठिनाई में डाल दिया गया है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) से राधाकृष्णन का समर्थन करने की अपील की है, जिससे यह चुनाव बेहद दिलचस्प बन गया है।

उपराष्ट्रपति चुनाव में भाजपा का दांव

सी. पी. राधाकृष्णन मूल रूप से तमिलनाडु के हैं और वर्तमान में महाराष्ट्र के राज्यपाल के रूप में कार्यरत हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष जे. पी. नड्डा ने मिलकर उनके नाम पर सहमति जताई। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राधाकृष्णन का चयन भी मोदी की रणनीतिक सोच का हिस्सा है। उनके नाम से न केवल महाराष्ट्र की राजनीति में असर पड़ेगा, बल्कि तमिलनाडु में भी डीएमके और एमडीएमके जैसे दलों में हलचल मच गई है, क्योंकि राधाकृष्णन के इन दलों से अच्छे संबंध रहे हैं।

भाजपा का इतिहास रहा है कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों में उसने विपक्षी खेमे को बांटने की कोशिश की है। 2007 में जब प्रतिभा पाटिल को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया था, तब शिवसेना ने भाजपा-एनडीए का हिस्सा होते हुए भी उन्हें समर्थन दिया था क्योंकि वे मराठी थीं। इसी तरह 2012 में शिवसेना ने यूपीए उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी को भी वोट दिया था। अब एक बार फिर इस बात पर निगाहें टिकी हैं कि क्या उद्धव ठाकरे और शरद पवार की पार्टियां भाजपा के उम्मीदवार को समर्थन देंगी।

मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा कि महाराष्ट्र के राज्यपाल को उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार बनाए जाना गर्व की बात है। राधाकृष्णन महाराष्ट्र के मतदाता भी हैं और उन्होंने विधानसभा चुनाव में मुंबई में मतदान किया था। फडणवीस ने मराठी अस्मिता का हवाला देते हुए कहा कि ठाकरे और पवार जैसे दलों को उनका समर्थन करना चाहिए। उन्होंने महाराष्ट्र के सभी सांसदों से अपील की कि वे राधाकृष्णन के पक्ष में वोट दें। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि ठाकरे और पवार इस राजनीतिक दांव पर क्या कदम उठाते हैं।