केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने एनसीईआरटी के सिलेबस में आपातकाल से संबंधित अध्याय शामिल किए जाने का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को देश के इतिहास के ऐसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील अध्यायों की जानकारी होना जरूरी है, ताकि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के प्रति जागरूकता बढ़े और भविष्य में ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति न हो।
चंडीगढ़ में एएनआई से बातचीत के दौरान धर्मेंद्र प्रधान ने कहा “यह सही है। NCERT ने सही किया है। आने वाली पीढ़ियों को आपातकाल जैसे काले कारनामों को जानना और समझना चाहिए ताकि ऐसी स्थिति दोबारा न आए। इसीलिए NCERT ने इसे विषय में लाया है और अच्छा काम किया है।”
पाठ्यक्रम में शामिल हुआ आपातकाल का अध्याय
बता दें कि एनसीईआरटी की कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान पुस्तक में वर्ष 1975 से 1977 के बीच लागू किए गए आपातकाल से जुड़े घटनाक्रम, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उसके प्रभाव और नागरिक अधिकारों पर पड़े असर का उल्लेख किया गया है। पाठ्यक्रम में इस दौर को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे विद्यार्थियों को संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और नागरिक स्वतंत्रताओं के महत्व को समझने में मदद मिल सके।
नई किताब ‘Understanding Society: India and Beyond’ (ग्रेड 9, पार्ट 1) के अध्याय 6 में ‘लोकतंत्र की चुनौतियां’ (Challenges to Democracy) शीर्षक के अंतर्गत यह सेक्शन जोड़ा गया है। इसमें आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के लिए एक प्रमुख चुनौती बताया गया है। पुस्तक में यह उल्लेख है कि आपातकाल के दौरान अधिकांश मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए। वहीं प्रेस सेंसरशिप बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों का भी संदर्भ दिया गया है।
धर्मेंद्र प्रधान ने इस कदम का समर्थन किया
धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि देश के इतिहास के सभी महत्वपूर्ण अध्यायों को निष्पक्ष रूप से पढ़ाया जाना चाहिए। उनके अनुसार आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का ऐसा दौर है जिसे समझना नई पीढ़ी के लिए आवश्यक है ताकि लोकतांत्रिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान की महत्ता के प्रति जागरूकता बनी रहे।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री ने कहा कि शिक्षा सिर्फ तथ्यों तक सीमित नहीं होनी चाहिए बल्कि विद्यार्थियों को इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाओं से सीख लेने का अवसर भी देना चाहिए। उनका कहना था कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए युवाओं को उन परिस्थितियों के बारे में जानना आवश्यक है, जब संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों पर व्यापक प्रभाव पड़ा था।






