पश्चिम बंगाल की राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिनका उदय सत्ता के गलियारों की दिशा ही बदल देता है। ऐसा ही एक नाम है शुभेंदु अधिकारी, जिन्होंने कभी ममता बनर्जी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालार के रूप में अपनी पहचान बनाई थी, लेकिन आज वे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के सबसे मजबूत स्तंभ और मुख्यमंत्री के रूप में स्थापित हो चुके हैं। यह कहानी केवल एक राजनेता के दल-बदल की नहीं है, बल्कि बंगाल की जमीनी राजनीति में एक ऐसे व्यक्ति के उदय की गाथा है जिसने एक मौजूदा मुख्यमंत्री को उनके ही गढ़ में दो बार शिकस्त देकर इतिहास रचा।
पूर्व मेदिनीपुर जिले के कांथी क्षेत्र के एक बेहद प्रभावशाली राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखने वाले शुभेंदु अधिकारी राजनीति के लिए कोई नया चेहरा नहीं हैं। उनके पिता सिसिर अधिकारी स्वयं एक दिग्गज राजनेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे हैं। शुभेंदु ने अपने राजनीतिक सफर का आगाज वर्ष 1995 में कांग्रेस के टिकट पर कांथी नगर पालिका से पार्षद का चुनाव जीतकर किया था। जब ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर वर्ष 1998 में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) का गठन किया, तो शुभेंदु उन शुरुआती नेताओं में से एक थे जिन्होंने ममता का खुलकर साथ दिया।
वर्ष 2007 का नंदीग्राम भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलन शुभेंदु अधिकारी के राजनीतिक करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। उन्होंने ‘भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी’ का कुशलतापूर्वक नेतृत्व किया और वामपंथी सरकार के खिलाफ जमीनी स्तर पर एक जोरदार लड़ाई लड़ी। इस आंदोलन ने न केवल बंगाल में 34 साल पुरानी वामपंथी सरकार की जड़ों को हिला दिया, बल्कि शुभेंदु को पूरे राज्य में एक कद्दावर जननेता के रूप में स्थापित कर दिया। उनकी इसी बढ़ती लोकप्रियता के कारण उन्होंने वर्ष 2009 और 2014 में तमलुक से लोकसभा चुनाव में जीत हासिल की और बाद में राज्य सरकार में परिवहन और सिंचाई जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी भी संभाली।
2020 में थामा भाजपा का दामन
समय के साथ टीएमसी के भीतर आंतरिक समीकरण बदलने लगे। पार्टी में ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव के चलते शुभेंदु अधिकारी और पार्टी के अन्य पुराने नेता खुद को हाशिए पर महसूस करने लगे। इसी गहरे असंतोष के परिणामस्वरूप वर्ष 2020 के अंत में शुभेंदु ने राज्य मंत्रिमंडल और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। दिसंबर 2020 में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में उन्होंने औपचारिक रूप से बीजेपी का दामन थाम लिया। उनके इस बड़े कदम ने टीएमसी के संगठनात्मक ढांचे को गहरा आघात पहुंचाया।
2021 विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को हराया
शुभेंदु की असली राजनीतिक ताकत वर्ष 2021 के विधानसभा चुनावों में तब देखने को मिली, जब उन्होंने नंदीग्राम सीट पर एक कड़े मुकाबले में स्वयं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 1,956 वोटों के अंतर से पराजित किया। लेकिन वर्ष 2026 के विधानसभा चुनाव ने उनके राजनीतिक कद को एक नए मुकाम पर पहुंचा दिया। 2026 में उन्होंने एक अभूतपूर्व रणनीति के तहत दो सीटों- नंदीग्राम और ममता बनर्जी के गढ़ भवानीपुर से चुनाव लड़ा। नतीजों ने पूरे देश को चौंका दिया; शुभेंदु ने नंदीग्राम में 9,665 वोटों से शानदार जीत दर्ज की, और भवानीपुर में ममता बनर्जी को 15,105 वोटों के भारी अंतर से मात दी। 2026 के इस चुनाव में बीजेपी ने राज्य में 200 से अधिक सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया, जिसका सबसे बड़ा रणनीतिक श्रेय शुभेंदु अधिकारी को ही दिया जा रहा है।
विपक्ष के नेता के रूप में टीएमसी सरकार को कई मुद्दों पर घेरा
विपक्ष के नेता के रूप में शुभेंदु अधिकारी ने टीएमसी सरकार को भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर लगातार घेरा। हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) लागू किए जाने पर शुभेंदु ने इसे बंगाली हिंदू शरणार्थियों के लिए एक ऐतिहासिक कदम बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कानून नागरिकता देने के लिए है, न कि किसी की नागरिकता छीनने के लिए, और उन्होंने टीएमसी पर इस मुद्दे पर जनता में भ्रम फैलाने का आरोप लगाया।
हालांकि, यह राजनीतिक सफर पूरी तरह विवादों से अछूता नहीं रहा है। शुभेंदु अधिकारी का नाम अतीत में सारदा चिट फंड और नारदा स्टिंग ऑपरेशन से जुड़ा था, हालांकि उनके खिलाफ अभी तक कोई दोष सिद्ध नहीं हुआ है। इसके अतिरिक्त, वर्ष 2026 के चुनावी हलफनामे के अनुसार उन पर 29 आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से अधिकांश टीएमसी छोड़ने के बाद दर्ज किए गए थे। उनके 2026 के चुनावी हलफनामे ने एक वित्तीय रहस्य भी उजागर किया है; जहां 2020-21 के मुकाबले उनकी वार्षिक आय 8.13 लाख रुपये से बढ़कर 17.38 लाख रुपये हो गई है, वहीं उनकी घोषित चल-अचल संपत्ति के कुल मूल्य में भारी गिरावट दर्ज की गई है (चल संपत्ति 59.31 लाख से घटकर 24.57 लाख रह गई है)।
शुभेंदु अधिकारी का कांग्रेस पार्षद से लेकर तृणमूल कांग्रेस के मुख्य रणनीतिकार और अब बीजेपी के बंगाल मुख्यमंत्री तक का सफर उनके कुशल जमीनी जुड़ाव और नेतृत्व क्षमता का स्पष्ट प्रमाण है। पूर्व मेदिनीपुर से निकलकर पूरे बंगाल की राजनीति को अपने इर्द-गिर्द घुमाने वाले शुभेंदु आज सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन के सबसे बड़े प्रतीक बन गए हैं।





