देश में बढ़ते साइबर अपराध पर अब तक की सबसे बड़ी डिजिटल कार्रवाई शुरू हो गई है। गृह मंत्रालय के नेतृत्व में काम कर रहे इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) ने देश भर में उन हॉटस्पॉट्स की पहचान की है, जहां से सबसे ज्यादा साइबर धोखाधड़ी को अंजाम दिया जा रहा है। हालिया डेटा विश्लेषण से पता चलता है कि यह अपराध अब कुछ शहरों तक सीमित नहीं, बल्कि एक संगठित और अंतर-राज्यीय नेटवर्क का रूप ले चुका है।
एजेंसियों द्वारा की गई मैपिंग में चेक, एटीएम और संदिग्ध बैंक खातों के जरिए होने वाले फ्रॉड के सबसे बड़े केंद्र सामने आए हैं। इन आंकड़ों से साफ है कि कुछ खास राज्यों में ठगों के नेटवर्क ने गहरी जड़ें जमा ली हैं, जिन्हें अब तकनीक और एजेंसियों के समन्वय से खत्म करने की तैयारी है।
साइबर ठगों के गढ़ बने ये राज्य, चौंकाने वाले हैं आंकड़े
वित्तीय लेन-देन की निगरानी के दौरान कुछ राज्यों में साइबर अपराध की गतिविधियां चरम पर पाई गईं। आंकड़ों के अनुसार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और बिहार संदिग्ध गतिविधियों के प्रमुख केंद्र बनकर उभरे हैं।
चेक निकासी के हॉटस्पॉट: चेक के माध्यम से संदिग्ध निकासी के कुल 3,827 मामले दर्ज हुए। इसमें राजस्थान (581 मामले) सबसे आगे रहा, जिसके बाद उत्तर प्रदेश (452), गुजरात (358), बिहार (311) और केरल (269) का स्थान है।
एटीएम निकासी के हॉटस्पॉट: एटीएम से धोखाधड़ी कर पैसे निकालने के मामले कहीं ज्यादा हैं। कुल 43,450 ऐसे मामले सामने आए, जिनमें बिहार (5806 मामले) शीर्ष पर है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश (5404), झारखंड (4675), दिल्ली (4503) और राजस्थान (4349) में भी बड़े पैमाने पर मामले दर्ज किए गए।
संदिग्ध बैंक खाते: देशभर में लगभग 54,869 बैंक खातों को संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ा पाया गया। सबसे ज्यादा संदिग्ध खाते राजस्थान (8355) में पाए गए। इसके बाद उत्तर प्रदेश (6528), बिहार (5721), असम (4782) और मध्य प्रदेश (3801) का नंबर आता है।
कैसे काम कर रहा है ‘डिजिटल स्ट्राइक’ का यह सिस्टम?
साइबर ठगों के इस संगठित नेटवर्क को तोड़ने के लिए केंद्र सरकार ने एक केंद्रीयकृत व्यवस्था बनाई है, जिसे I4C चलाता है। यह गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाली एक नोडल एजेंसी है, जिसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की पहल पर मजबूत किया गया है। इस सिस्टम का पूरा नाम Citizen Financial Cyber Fraud Reporting and Management System है, जो शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई सुनिश्चित करता है।
इस इकोसिस्टम में एक ही छत के नीचे कई एजेंसियां एक साथ काम करती हैं। इसमें विभिन्न राज्यों की पुलिस, देश के सभी प्रमुख बैंकिंग संस्थान, टेलीकॉम कंपनियां और ऑनलाइन पेमेंट गेटवे शामिल हैं। इन सभी को API इंटीग्रेशन के जरिए एक-दूसरे से जोड़ा गया है, जिससे सूचना का आदान-प्रदान रियल-टाइम में होता है।
शिकायत से लेकर कार्रवाई तक, मिनटों में एक्शन
जब कोई व्यक्ति साइबर ठगी का शिकार होता है, तो वह हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करता है या cybercrime.gov.in पोर्टल पर अपनी शिकायत दर्ज कराता है। शिकायत दर्ज होते ही यह तुरंत बैकएंड सिस्टम में पहुंच जाती है।
इसके बाद साइबर फ्रॉड मिटिगेशन सेंटर सक्रिय हो जाता है। एक मानकीकृत संचालन प्रक्रिया (SOP) के तहत सभी एजेंसियां समन्वित कार्रवाई शुरू करती हैं। जिस बैंक खाते या वॉलेट में पैसा गया है, उसे तुरंत ट्रैक किया जाता है और संबंधित बैंक को अलर्ट भेजकर ट्रांजैक्शन को फ्रीज करा दिया जाता है। इस तेज प्रक्रिया से ठगी गई रकम को रिकवर करने की संभावना काफी बढ़ जाती है। एजेंसियों का मानना है कि हॉटस्पॉट मैपिंग और रियल-टाइम निगरानी से इन नेटवर्कों को तेजी से ध्वस्त किया जा सकेगा।






