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UP में टेट्रा पैक में शराब बेचने पर रोक की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार, याचिकाकर्ता को राज्य सरकार के पास जाने की छूट

Written by:Shruty Kushwaha
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अदालत ने कहा कि यह मामला नीतिगत और प्रशासनिक स्तर का है इसलिए याचिकाकर्ता अपनी शिकायत राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों के समक्ष रखें। जनहित याचिका में छोटे पैक के कारण छात्रों और युवाओं पर संभावित नकारात्मक प्रभाव की चिंता जताई गई थी, हालांकि कोर्ट ने इस पर कोई ठोस टिप्पणी करने से इनकार कर दिया और मामले को राज्य स्तर पर उठाने को उचित बताया।
UP में टेट्रा पैक में शराब बेचने पर रोक की मांग पर सुप्रीम कोर्ट का इनकार, याचिकाकर्ता को राज्य सरकार के पास जाने की छूट

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में टेट्रा पैक में शराब बेचने की अनुमति को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका का निपटारा कर दिया है। हालांकि अदालत ने याचिका को पूरी तरह खारिज नहीं किया, बल्कि याचिकाकर्ता को राज्य सरकार के संबंधित अधिकारियों के पास अपना प्रतिनिधित्व देने की स्वतंत्रता दे दी है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले में स्पष्ट किया कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर फिलहाल अदालत टिप्पणी नहीं करेगी, क्योंकि एक्साइज नीति में इसकी स्पष्ट अनुमति नहीं दिखती।

सुप्रीम कोर्ट टेट्रा पैक में शराब बिक्री पर रोक लगाने की मांग से इनकार किया

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश में टेट्रा पैक में शराब की बिक्री पर रोक लगाने की मांग वाली जनहित याचिका पर हस्तक्षेप करने से फिलहाल इनकार कर दिया है। अदालत ने याचिकाकर्ता को यह स्वतंत्रता दी है कि वे अपनी आपत्तियों और मांगों को संबंधित राज्य प्राधिकरणों के समक्ष प्रतिनिधित्व के रूप में प्रस्तुत करें।

ये है मामला

यह याचिका उत्तर प्रदेश निवासी मीनाक्षी तिवारी द्वारा दायर की गई थी। याचिका में मुख्य रूप से टेट्रा पैक में शराब बेचने की अनुमति पर सवाल उठाया गया था, जिसमें दावा किया गया कि छोटे और आसानी से छिपाए जा सकने वाले पैक बच्चों तथा छात्रों के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि टेट्रा पैक की पैकेजिंग दूध या जूस के कार्टन जैसी दिखती है, जिससे छात्र इन्हें स्कूल या कॉलेज की बैग में आसानी से ले जा सकते हैं। इससे शैक्षणिक संस्थानों में शराब की अनचाही पहुंच बढ़ सकती है और युवा पीढ़ी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, अदालत ने अहमदाबाद जैसे शहरों का उदाहरण देते हुए पूछा कि क्या वहां ऐसी पैकेजिंग के कारण कोई विशिष्ट समस्या दर्ज हुई है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने की ये टिप्पणी

इस मामले पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि शराब खरीदने वाले लोग उसे किसी भी पैकेजिंग में खरीद सकते हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या ऐसा कोई ठोस उदाहरण मौजूद है, जहां टेट्रा पैक जैसी पैकेजिंग के कारण स्कूल या कॉलेज परिसरों में दखल या अनुशासन संबंधी समस्या सामने आई हो। उन्होंने टिप्पणी की “जो लोग शराब खरीदना चाहते हैं, वे किसी भी रूप में खरीद सकते हैं।”

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की एक्साइज नीति का अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि राज्य की आधिकारिक एक्साइज पॉलिसी में टेट्रा पैक में शराब बेचने की स्पष्ट अनुमति नहीं दी गई है। हालांकि, फरवरी 2025 में एक प्रशासनिक निर्णय के जरिए छोटे पैक में शराब की बिक्री को अनुमति मिली थी, जो रिकॉर्ड पर उपलब्ध है। कोर्ट ने कहा “इस मुद्दे पर टिप्पणी करना फिलहाल उचित नहीं होगा।” अदालत ने स्पष्ट किया कि याचिका में उठाई गई चिंताएं…खासकर छात्रों और शैक्षणिक माहौल पर संभावित प्रभाव गंभीर हैं, लेकिन इन्हें राज्य स्तर के अधिकारियों के समक्ष बेहतर तरीके से उठाया जा सकता है। अंत में अदालत ने याचिकाकर्ता को यह छूट दी कि वे अपनी याचिका की प्रति संबंधित सरकारी अधिकारियों को भेजकर लिखित प्रतिनिधित्व दे सकते हैं।

यूपी सरकार ने दी थी टेट्रा पैक में शराब बिक्री की अनुमति

बता दें कि उत्तर प्रदेश सरकार ने वर्ष 2025-26 की एक्साइज नीति के तहत कुछ श्रेणियों की शराब, विशेष रूप से कंट्री लिकर को टेट्रा पैक में बेचने की अनुमति दी थी। इसका उद्देश्य कांच की बोतलों से होने वाले नुकसान को कम करना, पैकेजिंग को अधिक सुरक्षित बनाना और संभावित मिलावट को रोकना था। छोटे पैक की सुविधा से ग्रामीण क्षेत्रों और कम आय वर्ग तक पहुंच आसान होने की उम्मीद थी।

सुप्रीम कोर्ट पहले ही जता चुका है चिंता

हालांकि, देशभर में टेट्रा पैक शराब को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहले भी चिंता जता चुका है। नवंबर 2025 में एक ट्रेडमार्क विवाद की सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमल्या बागची की पीठ ने टेट्रा पैक को “जूस बॉक्स जैसा” बताते हुए कहा था कि यह बच्चों के लिए खतरनाक हो सकता है, क्योंकि इसे स्कूल बैग में आसानी से छिपाया जा सकता है और माता-पिता को धोखा हो सकता है। कोर्ट ने तब राज्यों से पूछा था कि राजस्व के लालच में सार्वजनिक स्वास्थ्य को क्यों नजरअंदाज किया जा रहा है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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