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लता मंगेशकर: आवाज़ की दुनिया का सबसे सुरीला नाम, पहला ही गीत नहीं हुआ रिलीज, जानिए अनसुने किस्से

आज उनकी जयंती है पर सुरों की उस विरासत को याद करने का दिन है जो पीढ़ियों तक सुनाई देती रहेगी। लता मंगेशकर के गीतों को सुनते हुए लगता है कि आवाज सीधे मन तक पहुंच रही है। इसके पीछे वर्षों का रियाज, संगीत की बारीकी, रिकॉर्डिंग की कठिन परिस्थितियां और हर शब्द को भाव देने की मेहनत छिपी थी। किसी गीत में एक हल्की सी मुरकी, किसी शब्द पर ठहराव, कहीं आवाज का अचानक धीमा हो जाना और कहीं सुरों में उतरती गहराई...ये ऐसी बारीकियां है जिन्होंने उन्हें सबसे महान गायकों में शुमार किया है।
Lata Mangeshkar

Lata Mangeshkar

भारतीय फिल्म संगीत की दुनिया में कुछ आवाजें ऐसी हैं जो सदा के लिए अमर हो गई हैं। लता मंगेशकर वही आवाज़ हैं। वे भारतीय फिल्म संगीत की उन विरल आवाजों में रहीं जिनके लिए ‘महान’ शब्द भी छोटा लगता है। बचपन से संगीत की शिक्षा पाने वाली लता ने आगे चलकर पार्श्व गायन को सिर्फ आवाज देने की कला नहीं रहने दिया। उन्होंने शब्दों में भाव, धुन में सांस और सुरों में किरदार की उम्र तक उतार दी।

लता मंगेशकर का जन्म 28 सितंबर 1929 को इंदौर में हुआ था। संगीत उन्हें विरासत में मिला। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर रंगमंच और शास्त्रीय संगीत से जुड़े प्रतिष्ठित कलाकार थे। बचपन से ही लता ने संगीत की शिक्षा ली और आगे चलकर भारतीय पार्श्व गायन को एक ऐसी ऊंचाई दी जहां गायकी सिर्फ पर्दे के पीछे की आवाज नहीं रही, बल्कि फिल्म की कहानी और किरदारों की भावनाओं का अभिन्न हिस्सा बन गई। उनकी गायकी में सुर की शुद्धता तो थी ही, शब्दों की नजाकत और भावनाओं की गहराई भी थी। यही वजह रही कि कई पीढ़ियों के लिए गीत का मतलब ही लता मंगेशकर की आवाज बन गया।

लता मंगेशकर: संगीत की अमर विरासत

लता मंगेशकर की कहानी सिर्फ उनके मशहूर गीतों, पुरस्कारों और उपलब्धियों की कहानी नहीं है। उनके हजारों गीतों के पीछे रिकॉर्डिंग स्टूडियो के ऐसे कई किस्से भी हैं जिनमें कभी प्रयोग है, कभी संघर्ष और कभी संगीत के प्रति ऐसी बारीकी दिखाई देती है जो आज भी हैरान करती है। आज उनकी जयंती पर कुछ ऐसे किस्से जानते हैं, जो शायद बहुत से श्रोताओं ने पहले नहीं सुने होंगे।

पहली बार आवाज रिकॉर्ड हुई, लेकिन सुनाई नहीं दी 

लता मंगेशकर ने महज 13 वर्ष की उम्र में 1942 में मराठी फिल्म ‘किती हसाल’ के लिए ‘नाचू या गडे, खेलू सारी मनी हौस भारी’ गीत रिकॉर्ड किया था। लेकिन फिल्म के अंतिम संस्करण से यह गीत हटा दिया गया। यानी जिस आवाज को आगे चलकर दुनिया ने करोड़ों बार सुना, उसकी पहली रिकॉर्ड की गई आवाज ही पर्दे तक नहीं पहुंच सकी।

उनका पहला रिलीज हुआ हिंदी गीत बाद में ‘गजाभाऊ’ के लिए आया। हालांकि ये मराठी फिल्म थी लेकिन उनका गाया गीत हिंदी भाषा में था। इस तरह लता की संगीत यात्रा की शुरुआत ही एक ऐसे गीत से हुई जो रिकॉर्ड तो हुआ, लेकिन कभी रिलीज नहीं हो पाया।

अपने ही गीत सुनने से बचती थीं 

लता मंगेशकर के बारे में यह बात शायद सबसे ज्यादा हैरान करती है। इतनी बड़ी गायिका होने के बावजूद वह रिकॉर्डिंग के बाद बैठकर अपने गीत सुनना पसंद नहीं करती थीं। उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया था कि रिकॉर्डिंग खत्म होते ही वह अक्सर स्टूडियो से निकल जाती थीं। अपने गीत सुनने पर उन्हें उसमें अपनी गलतियां दिखाई देने लगती थीं और उन्हें लगता था कि वह उसे और बेहतर कर सकती थीं।

एक रिकॉर्डिंग में गर्मी से हो गईं बेहोश 

लता मंगेशकर की रिकॉर्डिंग से जुड़ा एक किस्सा पुराने दौर की तकनीकी परिस्थितियों की भी याद दिलाता है। उस समय स्टूडियो आज की तरह एयर कंडीशंड नहीं हुआ करते थे। रिकॉर्डिंग के दौरान अंतिम टेक में पंखे तक बंद कर दिए जाते थे, ताकि आवाज में कोई अनचाही ध्वनि न आए। महान संगीतकार नौशाद के साथ एक रिकॉर्डिंग के दौरान भीषण गर्मी के बीच गाते हुए लता के बेहोश हो जाने का प्रसंग उनके रिकॉर्डिंग अनुशासन से जुड़े संस्मरणों में मिलता है।

फिल्मफेयर में गायकों की आवाज को मिला अलग सम्मान

लता मंगेशकर और फिल्मफेयर पुरस्कारों का एक दिलचस्प अध्याय भी संगीत के इतिहास से जुड़ा है। शुरुआती दौर में पार्श्व गायकों के लिए कोई श्रेणी नहीं थी। इसके विरोध में लता मंगेशकर ने फिल्मफेयर समारोह में गाने से यह कहते हुए इनकार किया था कि जब पुरस्कार गायकों के लिए है ही नहीं, तो वह वहाँ क्यों गाएँ। इसके बाद 1959 में सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायक की श्रेणी शुरू हुई।

प्लेबैक सिंगिंग को स्वतंत्र श्रेणी के रूप में जगह मिली और लता मंगेशकर ने 1959 में ‘आ जा रे परदेसी’ गीत के लिए पहला पुरस्कार जीता। फिल्मफेयर के आधिकारिक रिकॉर्ड में यह पुरस्कार सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायन की संयुक्त श्रेणी के रूप में दर्ज है। इस बात को भी इतिहास याद रखेगा कि लता मंगेशकर बाद में नियमित प्रतिस्पर्धी श्रेणी से अलग हो गईं, ताकि नए गायकों को अवसर मिल सके।

रिकॉर्डिंग स्टूडियो उनके लिए पूजास्थल के समान

लता मंगेशकर के बारे में लंबे समय से यह प्रसंग सुनाया जाता है कि वह रिकॉर्डिंग स्टूडियो में नंगे पैर गाती थीं और उसे मंदिर की तरह सम्मान देती थीं। उनके लिए रिकॉर्डिंग का वह कमरा वह जगह था जहां शब्द, सुर और भाव एक साथ जन्म लेते थे। इसलिए माइक्रोफोन के सामने खड़े होना उनके लिए किसी रस्म से कम नहीं था।

आवाज को किरदार के मुताबिक बदलने की कला

उनकी सबसे बड़ी खूबियों में से एक सिर्फ उनका सुर नहीं, बल्कि किरदार के मुताबिक आवाज का रंग बदलना था। एक ही गायिका की आवाज कभी मासूम लड़की की लगती है तो कभी परिपक्व स्त्री की। पर्दे पर अभिनेत्री की उम्र, दृश्य की परिस्थिति और गीत के भाव के अनुसार उनकी गायकी का उच्चारण, ऊर्जा और भाव बदल जाता था।

यही वजह है कि दशकों के अंतराल में रिकॉर्ड हुए गीतों में भी वह पर्दे पर मौजूद किरदार की उम्र और मनःस्थिति के करीब सुनाई देती हैं। उनके बारे में चार ऑक्टेव तक की स्वर-सीमा का उल्लेख मिलता है, लेकिन लता की असली विशेषता सिर्फ सुरों की ऊंचाई नहीं थी…बल्कि ये थी कि वे सुर का चरित्र बदल सकती थीं।

दस मिनट में गाने के लिए तैयार 

लता की संगीत पकड़ को लेकर कई संस्मरण मिलते हैं। कहा जाता है कि कठिन रचनाओं को वह बेहद कम समय में आत्मसात कर लेती थीं। ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के शीर्षक गीत को लेकर भी ऐसा प्रसंग सामने आता है कि लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने धुन की रूपरेखा उन्हें बेहद कम समय में समझाई और उन्होंने उसे तुरंत पकड़ लिया। मन्ना डे के साथ कठिन शास्त्रीय अंदाज के युगल गीतों के लिए भी उनकी तैयारी और रियाज का उल्लेख मिलता है।

‘प्यार किया तो डरना क्या’ गीत में आवाज को तकनीक से भी रचा गया

फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ का ‘प्यार किया तो डरना क्या’ सिर्फ अपनी धुन और गायकी के कारण यादगार नहीं है। इसकी रिकॉर्डिंग अपने समय की तकनीकी कल्पनाशीलता का भी उदाहरण मानी जाती है। संगीतकार नौशाद ने गीत की धुन और वाद्य संयोजन को बेहद विस्तार दिया। लता की आवाज को अलग-अलग ढंग से रिकॉर्ड करके उसके प्रभाव को मूल ट्रैक में मिलाया गया। इस तरह गीत में जो गूंज, विस्तार और शाही भव्यता सुनाई देती है, उसमें गायकी के साथ रिकॉर्डिंग तकनीक की भी भूमिका थी। यह वह दौर था जब आज जैसी डिजिटल तकनीक नहीं थी। इसलिए स्टूडियो में किए गए ऐसे प्रयोग अपनेआप में बड़ी उपलब्धि थे।

सिर्फ गाया नहीं, संगीत भी रचा

बहुत कम लोग लता मंगेशकर को संगीत निर्देशक के रूप में याद करते हैं। उन्होंने मराठी फिल्मों में ‘आनंदघन’ नाम से संगीत निर्देशन किया। ‘साधी माणसं’ जैसी फिल्म के लिए उनके संगीत निर्देशन को महाराष्ट्र सरकार का पुरस्कार भी मिला।

उनकी आवाज की गूंज हॉलीवुड तक पहुंची

लता मंगेशकर की आवाज की यात्रा सिर्फ भारतीय सिनेमा तक सीमित नहीं रही। 2004 की हॉलीवुड फिल्म ‘इटर्नल सनशाइन ऑफ द स्पॉटलेस माइंड’ में ‘नागिन’ का ‘तेरे संग प्यार मैं नहीं तोड़ना’ और ‘दिल तुझको दिया’ का ‘वादा न तोड़’ जैसे गीत इस्तेमाल हुए। फिल्म के संगीत क्रेडिट में इन गीतों का उल्लेख मिलता है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha →
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