पश्चिम बंगाल के सियासी रण में भले ही तृणमूल कांग्रेस को मात खानी पड़ी हो, लेकिन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तेवर अब भी आक्रामक है। यह चुनावी हार उन्हें शांत नहीं कर पाई, बल्कि एक नई जंग का बिगुल फूंक गई। राज्य में अपनी पार्टी की जमीन खिसकने के बाद उन्होंने भाजपा और चुनाव आयोग पर तीखे हमले बोले हैं। ममता बनर्जी ने स्पष्ट शब्दों में हुंकार भरी है कि उनकी पार्टी इस सियासी झटके से उबरकर और भी दमदार वापसी करेगी, हार से न तो वह भयभीत हैं और न ही पीछे हटने को तैयार।
दीदी ने सीधे तौर पर भाजपा पर चुनावी लूट का आरोप मढ़ दिया। उनके शब्दों में, भगवा दल ने 100 से अधिक विधानसभा सीटें बेईमानी से झपट ली हैं। चुनाव आयोग को भी उन्होंने कटघरे में खड़ा करते हुए तीखा वार किया कि यह संस्था अब भाजपा का ‘कमीशन’ बनकर रह गई है। ममता बनर्जी ने खुलासा किया कि उन्होंने इस संबंध में चुनाव अधिकारी और मनोज अग्रवाल से शिकायत भी की थी, परंतु उनके कानों पर जूं तक नहीं रेंगी, कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस ‘जीत’ की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाते हुए, ममता ने इसे लोकतंत्र पर सीधा प्रहार बताया। उन्होंने तीखे लहजे में पूछा, ‘क्या आपको लगता है कि यह कोई नैतिक जीत है? यह तो अनैतिकता का नंगा नाच है।’ ममता बनर्जी यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और केंद्रीय सुरक्षा बलों की मिलीभगत से जो कुछ भी हुआ है, उसे पूरी तरह से गैर-कानूनी करार दिया। उनके अनुसार, ‘यह सिर्फ लूट, लूट और लूट है।’ इस लूट के बावजूद हम फिर से वापसी करेंगे, उनका अटल विश्वास है।
15 साल बाद सत्ता विरोधी लहर से जूझी टीएमसी
टीएमसी को 15 साल के लंबे शासन के बाद राज्य में एक भीषण सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा। जनता के मन में असंतोष की आग धधक रही थी। जमीनी स्तर पर पार्टी के प्रति जनता में उपजा असंतोष, भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप और आर्थिक पिछड़ेपन जैसे नासूर बन चुके मुद्दों ने मतदाताओं को एक नया विकल्प खोजने पर विवश कर दिया। इसके साथ ही, चुनाव में धार्मिक ध्रुवीकरण का ‘काला जादू’ भी एक बड़े कारक के रूप में सामने आया। भाजपा द्वारा लगाए गए तुष्टिकरण के आरोपों और हिंदू मतों के बड़े पैमाने पर हुए एकीकरण ने टीएमसी के पारंपरिक वोट बैंक में गहरी सेंध लगाई। परिणाम यह हुआ कि पार्टी अपने कई मजबूत गढ़ों में भी पिछड़ गई, जिसका दर्द अब भी टीएमसी को कचोट रहा है।
इतना ही नहीं, पार्टी के भीतर पनपी आंतरिक कलह और पुराने, विश्वसनीय सहयोगियों का साथ छोड़ना भी टीएमसी के लिए एक भारी बोझ साबित हुआ। अभिषेक बनर्जी की ओर से समय-समय पर दी गई आंतरिक चेतावनियों के बावजूद, गुटबाजी का जहर पार्टी में फैलता रहा और स्थानीय स्तर पर नेताओं के मनमाने व्यवहार ने जनता में नाराजगी की आग को और भड़का दिया। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच बदलती प्राथमिकताओं और मतदाताओं की नई आकांक्षाओं को समझने में पार्टी की विफलता ने टीएमसी की सीटों के आंकड़े को रसातल में धकेल दिया। ममता बनर्जी भले ही हार मानने को तैयार न हों, पर सियासी बिसात पर बिछी यह बाजी उनके लिए सबक से कम नहीं।






