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मुंबई में 9 साल की बच्ची की रेबीज से मौत, जरा सी लापरवाही भी पड़ सकती है भारी, जानिए रेबीज से बचने के उपाय

Written by:Shruty Kushwaha
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रेबीज का वायरस धीरे-धीरे शरीर में फैलकर दिमाग पर असर डालता है और एक बार लक्षण दिखने लगें तो बचाव लगभग असंभव हो जाता है। ऐसे में जरूरी है कि किसी भी तरह की खरोंच या काटने की घटना को गंभीरता से लेते हुए तुरंत घाव की सफाई और पूरा टीकाकरण कराया जाए। समय पर इलाज ही इस बीमारी से बचने का एकमात्र तरीका है।
मुंबई में 9 साल की बच्ची की रेबीज से मौत, जरा सी लापरवाही भी पड़ सकती है भारी, जानिए रेबीज से बचने के उपाय

Stray Dogs

मुंबई के पास नालासोपारा में 9 साल की बच्ची की रेबीज से मौत हो गई। बच्ची को छह महीने पहले कुत्ते से एक खरोंच लगी थी और इंजक्शन के डर से उसका इलाज अधूरा छोड़ दिया गया। इस दर्दनाक घटना ने रेबीज की भयावहता को एक बार फिर उजागर कर दिया है। यह मामला बताता है कि कुत्ते का काटना ही नहीं, बल्कि हल्की सी खरोंच भी कितनी घातक साबित हो सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि कुत्ते के नाखून या दांत पर लार लगी हो तो वायरस शरीर में प्रवेश कर सकता है। कई बार घाव छोटा होता है या जल्दी भर जाता है जिससे लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर संक्रमण बढ़ता रहता है और बाद में गंभीर रूप ले लेता है।

कुत्ते की खरोंच से बच्ची की मौत 

कशिश सहानी मात्र 9 वर्ष की थी और चौथी कक्षा में पढ़ती थी। करीब छह महीने पहले जब वह अपने दादा के साथ जा रही थी, तभी एक आवारा कुत्ते के नाखून से उसके हाथ पर खरोंच लग गई। अगले दिन परिवार उसे इलाज के लिए ले गया, लेकिन इंजेक्शन के डर से बच्ची घबरा गई और उपचार अधूरा रह गया। घाव जल्दी भर जाने के कारण परिवार ने आगे इस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन इसी लापरवाही ने कशिश की जान ले ली।

बेहद खतरनाक है रेबीज

डॉक्टरों के अनुसार रेबीज अत्यंत खतरनाक बीमारी है। आवारा कुत्ता काटे या सिर्फ नोंचे, इन दोनों ही स्थितियों में खतरा समान है। कई बार घाव छोटा होता है और जल्दी भर जाता है लेकिन वायरस शरीर में चुपके से फैलता रहता है। यह संक्रमण व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करता है कि कितनी तेजी से दिमाग तक पहुंचता है। एक बार लक्षण दिखने लगें तो बचना लगभग असंभव हो जाता है।

कुत्ते के काटने या नोंचने पर तुरंत कराएं इलाज

रेबीज वायरस मुख्य रूप से संक्रमित कुत्ते की लार से फैलता है। भारत में 99 प्रतिशत मामले कुत्ते के काटने या खरोंच से ही होते हैं। इन्क्यूबेशन पीरियड आमतौर पर एक से तीन महीने का होता है लेकिन कई मामलों में यह सालों बाद भी लक्षण दिखा सकता है। शुरुआती लक्षणों में घाव वाली जगह पर जलन, बुखार और बेचैनी शामिल है। बाद में पानी पीने से डर (हाइड्रोफोबिया), हवा से डर, मुंह से झाग निकलना, ऐंठन और लकवा जैसी स्थिति हो जाती है। लक्षण शुरू होने के बाद मौत की दर लगभग 100 प्रतिशत होती है। यह बीमारी बेहद खतरनाक मानी जाती है क्योंकि एक बार इसके लक्षण दिखने लगें तो मरीज को बचाना लगभग असंभव हो जाता है। खास बात यह है कि इसका संक्रमण तुरंत न दिखे तो भी कई हफ्तों, महीनों या कभी-कभी सालों बाद सामने आ सकता है।

इस बीमारी से बचने के लिए सबसे जरूरी है तुरंत और सही उपचार करवाना। काटने या खरोंच लगने के तुरंत बाद घाव को कम से कम 15 मिनट तक बहते पानी और साबुन से अच्छी तरह धोना चाहिए। इसके बाद एंटीसेप्टिक दवा लगानी चाहिए। बिना देरी के डॉक्टर के पास जाकर एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) शुरू करानी चाहिए। सामान्य तौर पर पहले, 3, 7, 14 और 28 दिन पर पांच डोज लगाई जाती है। अगर घाव गहरा हो, खून बह रहा हो या चेहरे, गर्दन व हाथों पर हो तो रेबीज इम्यूनोग्लोबुलिन (RIG) भी लगवाना जरूरी होता है। इसी के साथ टिटनेस का इंजेक्शन भी लगाना ज़रूरी है।

कभी न करें ये गलती

रेबीज को हल्के में लेकर घरेलू उपाय जैसे हल्दी, नींबू या तेल लगाना बिल्कुल नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे वायरस और तेजी से फैल सकता है। झोलाछाप दवा या जड़ी-बूटी से भी बचना चाहिए। अगर घर में पालतू कुत्ता या बिल्ली है तो उन्हें हर साल रेबीज का टीका लगवाएं। आवारा कुत्तों के नियंत्रण और टीकाकरण के लिए स्थानीय नगर निगम या नगरपालिका से संपर्क करें। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, घाव को तुरंत धोने और समय पर वैक्सीन लगवाने से रेबीज को 100 प्रतिशत रोका जा सकता है। मासूम कशिश की मौत एक चेतावनी है कि इंजेक्शन का डर मौत से बड़ा नहीं होता। छोटी-सी खरोंच को भी कभी नजरअंदाज न करें। परिवार, स्कूल और समाज को रेबीज के प्रति जागरूक रहना होगा। आवारा कुत्तों पर नियंत्रण और बड़े स्तर पर टीकाकरण अभियान चलाकर भी ऐसी त्रासदियों को रोका जा सकता है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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