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पुणे के छात्रों का कमाल, इसरो के फ्लाई मी ऑन मार्स रोबोटिक चैलेंज में लहराया जीत का परचम

Written by:Mini Pandey
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यह जीत इसलिए खास है क्योंकि मंगल पर उड़ान भरने वाला पहला हेलीकॉप्टर, नासा का इंजेन्यूटी, भारतीय-अमेरिकी इंजीनियर डॉ. बॉब बलराम ने बनाया था।
पुणे के छात्रों का कमाल, इसरो के फ्लाई मी ऑन मार्स रोबोटिक चैलेंज में लहराया जीत का परचम

पुणे इंस्टीट्यूट ऑफ कंप्यूटर टेक्नोलॉजी (पीआईसीटी) के छात्रों की टीम गैलेक्टिक गियरहेड्स ने इसरो के फ्लाई मी ऑन मार्स रोबोटिक चैलेंज में पहला स्थान हासिल किया है। इसरो के यू आर राव सैटेलाइट सेंटर द्वारा आयोजित इस प्रतियोगिता में छात्रों को मंगल ग्रह की सतह पर बिना जीपीएस या कंपास के उड़ने वाला ड्रोन बनाना था। हृषिकेश पटवर्धन, निमिष सातव और कौशल चौधरी की अगुआई वाली इस टीम ने 1.7 किलोग्राम का हल्का ड्रोन बनाया, जो इसरो की 2 किलोग्राम की सीमा में था।

इस ड्रोन ने मंगल जैसे वातावरण में कई मुश्किल काम किए, जैसे ऊर्ध्वाधर उड़ान, हवा में स्थिर रहना, सुरक्षित लैंडिंग और बेस पर वापसी। चूंकि मंगल पर पारंपरिक नेविगेशन सिस्टम काम नहीं करते, इसलिए टीम ने ऑप्टिकल फ्लो और LiDAR तकनीक का उपयोग करके ड्रोन को स्वायत्त बनाया। उन्होंने अपने कॉलेज में 9x12 मीटर का मंगल जैसा टेस्ट क्षेत्र भी बनाया, ताकि ड्रोन का परीक्षण कर सकें।

मंगल पर उड़ान भरने वाला पहला हेलीकॉप्टर

यह जीत इसलिए खास है क्योंकि मंगल पर उड़ान भरने वाला पहला हेलीकॉप्टर, नासा का इंजेन्यूटी, भारतीय-अमेरिकी इंजीनियर डॉ. बॉब बलराम ने बनाया था। गैलेक्टिक गियरहेड्स को उम्मीद है कि उनका ड्रोन भविष्य में भारत के मंगल मिशनों का हिस्सा बनेगा। इसरो पहले ही मंगलयान के बाद एक और मिशन की योजना बना रहा है, जिसमें मंगल पर सॉफ्ट लैंडिंग की कोशिश होगी।

अंतरिक्ष समस्याओं को हल करने का मौका

यह चैलेंज भारत के युवाओं की प्रतिभा को दिखाता है और इसरो की उस सोच को रेखांकित करता है, जिसमें छात्रों को असली अंतरिक्ष समस्याओं को हल करने का मौका दिया जाता है। अगर पीआईसीटी का यह ड्रोन और बेहतर किया गया तो यह भारत के मंगल मिशनों में स्वदेशी तकनीक के रूप में शामिल हो सकता है।