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सार्वजनिक नमाज को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी पर बोले मौलाना शहाबुद्दीन रजवी, कहा – ‘इस्लाम भी ऐसी जगह नमाज की इजाजत….’

Written by:Ankita Chourdia
Published:
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सार्वजनिक भूमि पर नमाज को लेकर अहम टिप्पणी की है। मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस फैसले को जायज ठहराते हुए कहा कि इस्लाम भी ऐसी जगह नमाज की इजाजत नहीं देता। जानिए पूरा मामला क्या है?
सार्वजनिक नमाज को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणी पर बोले मौलाना शहाबुद्दीन रजवी, कहा – ‘इस्लाम भी ऐसी जगह नमाज की इजाजत….’

सार्वजनिक भूमि पर नमाज अदा करने को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा की गई अहम टिप्पणी ने देश भर में एक नई बहस छेड़ दी है। इस महत्वपूर्ण टिप्पणी पर अब ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। मौलाना रजवी ने हाईकोर्ट के इस फैसले को जायज ठहराया है और कहा कि शरियते इस्लामिया में भी यह बात स्पष्ट रूप से कही गई है कि ऐसी जगह पर नमाज न पढ़ी जाए, जहां कोई विवाद या तनाव हो अथवा किसी को कोई आपत्ति हो। उन्होंने मुस्लिम समुदाय को नसीहत दी है कि ऐसी जगहों पर नमाज पढ़ने से बचना चाहिए।

दरअसल मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने इस बात पर जोर दिया कि सार्वजनिक भूमि सभी का समान अधिकार होता है, और इसका एकतरफा उपयोग कानूनन स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने कहा कि शरियत के अनुसार, अगर किसी स्थान पर नमाज पढ़ने से लोगों को परेशानी होती है या विवाद की स्थिति बनती है, तो वहां नमाज अदा करने से बचना ही बेहतर है। इतना ही नहीं, मौलाना ने यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक जगहों पर नमाज अदा करने से खुद नमाज पढ़ने वाला भी डिस्टर्ब होता है, क्योंकि ऐसी जगहों पर ट्रैफिक और आम लोगों की आवाजाही लगातार बनी रहती है।

लोगों की समस्याएं बढ़ जाती हैं: मौलाना शहाबुद्दीन रजवी

ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने अपने बयान में आगे कहा कि सार्वजनिक जगहों पर नमाज पढ़ने से अक्सर लोगों की समस्याएं बढ़ जाती हैं। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि इस्लाम किसी को तकलीफ नहीं देना चाहता। इस्लाम का मूल सिद्धांत ही सभी के लिए रहम और सहिष्णुता का नजरिया रखना है। इसलिए, मौलाना ने मुस्लिम समुदाय को सलाह दी है कि वे सार्वजनिक जगहों पर नमाज अदा करने के बजाय अपनी दुकान, मकान या मस्जिदों में नमाज पढ़ें। ऐसा करने से नमाज की अहमियत बनी रहेगी और किसी को कोई असुविधा भी नहीं होगी।

जानिए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्या कहा?

दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ किया था कि धर्म का पालन करने का अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन है। अदालत ने कहा कि इस अधिकार का प्रयोग इस तरह से नहीं किया जा सकता कि यह दूसरों के अधिकारों में हस्तक्षेप करे। हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि भूमि को निजी मान भी लिया जाए, तो भी याचिकाकर्ता मांगी गई राहत का हकदार नहीं है, क्योंकि सार्वजनिक व्यवस्था और दूसरों के अधिकारों का सम्मान सर्वोपरि है। अदालत की इस टिप्पणी ने धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं और सार्वजनिक स्थानों के उपयोग पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है।

मौलाना शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने हाईकोर्ट के इस तर्क को पूरी तरह से स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि इस्लाम सह-अस्तित्व और शांति का संदेश देता है, और अगर किसी धार्मिक क्रिया से दूसरों को परेशानी होती है, तो उसे निजी दायरे में ही करना उचित है। इस फैसले पर एक अन्य मुस्लिम धर्म गुरु चौधरी इफराहीम हुसैन ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस निर्णय को सराहनीय बताया है, जो यह दर्शाता है कि धार्मिक मामलों में भी न्यायपालिका के फैसले को व्यापक समर्थन मिल रहा है, खासकर जब वे सार्वजनिक शांति और व्यवस्था के हित में हों। यह स्थिति मुस्लिम समुदाय के भीतर भी इस मुद्दे पर एक व्यापक सहमति को दर्शाती है।

Ankita Chourdia
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