सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि आयुर्वेद के खिलाफ भ्रामक विज्ञापनों से संबंधित मामले को बंद कर दिया है और पहले लगाए गए अस्थायी प्रतिबंध को हटा लिया है। कोर्ट ने अपने पिछले आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें विज्ञापनों के लिए सख्त जांच और मंजूरी की आवश्यकता थी। जस्टिस बीवी नागरथना ने कहा, “जब उत्पादन की अनुमति दी जाती है तो उस उत्पाद का विज्ञापन करना एक स्वाभाविक व्यावसायिक प्रथा है।”

केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने तर्क दिया कि मौजूदा कानूनी ढांचा पहले से ही झूठे चिकित्सा दावों को रोकता है जिससे नियम 170 अनावश्यक हो गया। नियम 170 में पारंपरिक चिकित्सा विज्ञापनों के लिए पूर्व-मंजूरी की आवश्यकता थी। हालांकि, एक हस्तक्षेपकर्ता की ओर से अधिवक्ता प्रणव सचदेव ने भ्रामक विज्ञापनों के खतरों के बारे में चेतावनी दी और कहा कि कई लोग आसानी से इनके प्रभाव में आ जाते हैं।

अवमानना की कार्यवाही

सुप्रीम कोर्ट ने पतंजलि के प्रवर्तकों, बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही को भी बंद कर दिया, क्योंकि उन्होंने बार-बार माफी मांगी। इससे कंपनी को बिना किसी कानूनी बाधा के अपना परिचालन जारी रखने की अनुमति मिल गई। नियम 170 को हटाने से विज्ञापन प्रथाओं में कम प्रतिबंध की दिशा में बदलाव का संकेत मिलता है जिससे उपभोक्ता संरक्षण और व्यावसायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन को लेकर बहस शुरू हो गई है।

याचिका में मांगी गई राहत

सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम आदेश में कहा कि याचिका में मांगी गई राहत प्राप्त हो चुकी है और मामले पर आगे विचार की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने उपभोक्ता संरक्षण और व्यावसायिक प्रथाओं के बीच संतुलन बनाए रखने के महत्व पर जोर दिया, साथ ही विज्ञापन मानकों में सतर्कता की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।