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Freebie Culture: चुनावी कैश ट्रांसफर और मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता, पूछा- घाटे में चल रहे राज्य पैसा कहां से ला रहे हैं?

Written by:Ankita Chourdia
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सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से पहले राज्यों द्वारा घोषित की जा रही मुफ्त योजनाओं और डायरेक्ट कैश ट्रांसफर पर कड़ी टिप्पणी की है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसे देश के आर्थिक विकास के लिए हानिकारक बताते हुए सवाल किया कि घाटे में चल रहे राज्य इन योजनाओं के लिए पैसा कहां से जुटा रहे हैं।
Freebie Culture: चुनावी कैश ट्रांसफर और मुफ्त योजनाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता, पूछा- घाटे में चल रहे राज्य पैसा कहां से ला रहे हैं?

नई दिल्ली। देश में चुनाव से ठीक पहले राज्यों द्वारा घोषित की जा रही मुफ्त योजनाओं और कैश ट्रांसफर के बढ़ते चलन पर सुप्रीम कोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की है। अदालत ने इस ‘फ्रीबी कल्चर’ को देश के दीर्घकालिक आर्थिक विकास में एक बड़ी बाधा करार दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यह प्रवृत्ति तुष्टीकरण का रूप लेती जा रही है, जो राष्ट्र निर्माण के लिए ठीक नहीं है।

यह सुनवाई तमिलनाडु पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड द्वारा दायर एक याचिका पर हो रही थी, जिसमें बिजली संशोधन नियम 2024 के एक नियम को चुनौती दी गई है। इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली भी शामिल थे।

‘अगर सब मुफ्त मिलेगा, तो काम क्यों करेगा कोई?’

सुनवाई के दौरान अदालत ने इस नीति के सामाजिक प्रभाव पर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया। CJI सूर्यकांत ने कहा, “अगर लोगों को मुफ्त बिजली, मुफ्त गैस, मुफ्त भोजन और सीधे उनके बैंक खातों में पैसा मिलने लगे, तो वे काम पर क्यों जाएंगे?” कोर्ट का मानना था कि इस तरह की ‘ब्लैंकेट फ्रीबी’ संस्कृति देश की कार्यसंस्कृति को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है।

“यह एक गंभीर मुद्दा है। बिना यह फर्क किए कि कौन सक्षम है और कौन जरूरतमंद, सभी को समान लाभ देना सही नीति नहीं हो सकती। इससे लोग काम से दूर होते हैं, जो राष्ट्र के लिए चिंता का विषय है।” — सुप्रीम कोर्ट

अदालत ने स्पष्ट किया कि जरूरतमंदों की मदद करना राज्य का संवैधानिक और नैतिक दायित्व है, लेकिन जब इसका लाभ सक्षम और संपन्न वर्ग तक भी पहुंचने लगे, तो यह नीति की एक गंभीर खामी को दर्शाता है।

घाटे में राज्य, फिर कहां से आ रहा पैसा?

पीठ ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि कई राज्य पहले से ही वित्तीय घाटे में चल रहे हैं, इसके बावजूद वे ऐसी योजनाओं की घोषणा कैसे कर पा रहे हैं। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा, “यह पैसा आखिर आ कहां से रहा है? क्या इस पैसे का इस्तेमाल सड़क, अस्पताल, स्कूल और अन्य महत्वपूर्ण विकास कार्यों के लिए नहीं किया जाना चाहिए?”

कोर्ट ने संकेत दिया कि सभी राजनीतिक दलों और नीति निर्धारकों को इस मॉडल पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। अदालत के अनुसार, राज्यों को रोजगार के अवसर पैदा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ताकि लोग आत्मनिर्भर और सम्मान के साथ अपना जीवन जी सकें, न कि मुफ्त की सुविधाओं पर आश्रित हों। यदि राज्य की राशि का उपयोग केवल चुनावी लाभ के लिए किया जाता रहा, तो देश का समग्र विकास निश्चित रूप से प्रभावित होता रहेगा।

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