सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में फैसला सुनाया है कि केवल शिकायतकर्ता का अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय से होना, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के प्रावधानों को लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध का कारण विशेष रूप से पीड़ित की जातिगत या जनजातीय पहचान होनी चाहिए। यह फैसला 22 जुलाई को जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जिसमें एक व्यक्ति और उसकी अलग हो चुकी पत्नी के बीच घरेलू विवाद से उत्पन्न आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ता ने SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराओं 294, 323 और 506 के तहत कार्यवाही को रद्द करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि विवाद में कोई जातिगत आधार नहीं था और SC/ST एक्ट का गलत तरीके से उपयोग किया गया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पहले इस आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत अपराध तभी माना जाएगा, जब SC/ST समुदाय के व्यक्ति को अपमानित या डराने का स्पष्ट इरादा हो और यह कृत्य सार्वजनिक स्थान पर हुआ हो। कोर्ट ने जोर दिया कि अपमान या धमकी का कारण स्पष्ट रूप से पीड़ित की जातिगत पहचान होनी चाहिए।
क्या था पूरा मामला
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में आरोप वैवाहिक विवाद से उत्पन्न हुए थे और शिकायत में कोई ऐसा तथ्य या सामग्री नहीं थी, जो यह दर्शाए कि अपमान या गाली-गलौज शिकायतकर्ता की जाति के कारण थी। शिकायत में यह भी नहीं कहा गया कि कथित कृत्य जातिगत दुर्भावना से प्रेरित थे या सार्वजनिक स्थान पर हुए। कोर्ट ने अपने पहले के फैसले, हितेश वर्मा बनाम उत्तराखंड राज्य (2020), का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि निजी प्रकृति के विवाद, जैसे संपत्ति या घरेलू मामले, SC/ST एक्ट के दायरे में नहीं आते, जब तक कि जातिगत दुर्भावना का स्पष्ट संकेत न हो।
एससी ने फैसले में क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट ने SC/ST एक्ट के तहत कार्यवाही को रद्द कर दिया लेकिन IPC की धाराओं के तहत आरोपों को ट्रायल कोर्ट में मेरिट के आधार पर तय करने के लिए छोड़ दिया। इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित समुदायों के अधिकारों की रक्षा जरूरी है, लेकिन आपराधिक कानून का दुरुपयोग तब नहीं होना चाहिए, जब आवश्यक वैधानिक शर्तें पूरी न हों। कोर्ट ने यह सुनिश्चित करने की कोशिश की है कि विशेष कानून का उपयोग सटीकता के साथ हो और इसका दुरुपयोग न हो।





