सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि वैवाहिक जीवन में पति-पत्नी के बीच कुछ दिनों तक संवाद न होना अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने पत्नी की आत्महत्या के मामले में पति को बरी करते हुए स्पष्ट किया कि बिना ठोस सबूत के सिर्फ संवाद न करने के आधार पर किसी को भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने जयेश कन्ना की अपील को स्वीकार करते हुए निचली अदालत और मद्रास हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। जयेश कन्ना को अपनी पत्नी की आत्महत्या के मामले में तीन साल की सजा हुई थी जिसे अब समाप्त कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
वैवाहिक जीवन में कुछ दिनों तक संवाद न होना अपने आप में कानूनी रूप से ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता। इसी महत्वपूर्ण टिप्पणी के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसे व्यक्ति को बरी कर दिया है जिसे पत्नी की आत्महत्या के मामले में निचली अदालत और मद्रास हाईकोर्ट ने दोषी ठहराया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह आरोप कि पति ने 13 दिनों तक पत्नी से बात नहीं की, बिना ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के भारतीय दंड संहिता की धारा 498A के तहत क्रूरता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
क्या है मामला
मामला वर्ष 2015 का है। संगीता नाम की महिला ने 31 जनवरी को अपने मायके में आत्महत्या कर ली थी। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि पति जयेश (जो उस समय मस्कट, ओमान में नौकरी कर रहे थे) और उनके परिवार ने दहेज की मांग की तथा उत्पीड़न किया। खासतौर पर 18 से 31 जनवरी के बीच करीब 13 दिनों तक पति का पत्नी से फोन पर बात न करना ही मुख्य आधार बना। निचली अदालत ने परिवार के अन्य सदस्यों को बरी कर दिया और दहेज मृत्यु के आरोप से भी मुक्त किया, लेकिन गैर-संवाद को मानसिक क्रूरता मानते हुए पति को दोषी ठहराया। मद्रास हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा था।
न्यायालय ने पति को बरी किया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष के पास पर्याप्त सबूत नहीं थे। कोर्ट ने टिप्पणी की “बिना किसी सामग्री के, मृतका के साथ 13 दिनों तक गैर-संवाद को, बिना पुख्ता सबूत के, किसी भी कल्पना में इस मामले के तथ्यों में क्रूरता की श्रेणी में नहीं लाया जा सकता।” अदालत ने यह भी कहा कि इस मामले में पति-पत्नी के बीच कोई झगड़ा भी साबित नहीं हुआ था। बेंच ने कहा कि अदालतों को हर मामले में तथ्यों, परिस्थितियों और आरोपी के कार्यों का गहन विश्लेषण करना चाहिए। अदालत के अनुसार यह जांचना आवश्यक है कि आरोपी का कथित व्यवहार इतना गंभीर था या नहीं जिससे पीड़ित की मानसिक स्थिति पर खतरनाक प्रभाव पड़ा हो या उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाने के लिए विवश होना पड़ा हो। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि “एक व्यक्ति के लिए जो क्रूरता है, दूसरे के लिए नहीं भी हो सकती।” इसलिए कोई एक समान नियम नहीं बनाया जा सकता है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को पलटते हुए पति को बरी कर दिया है।






