मालवा का नीमच जिला, जो अपनी वैध अफीम की खेती के लिए पूरे देश में जाना जाता है, अब पोस्तादाने की आड़ में चल रहे एक बड़े अवैध कारोबार के कारण सुर्खियों में है। पिछले दो वर्षों में हुई विभिन्न कार्रवाईयों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पोस्तादाने की छनाई से निकलने वाली धोलापाली (अफीम का काला दाना) की तस्करी एक संगठित रैकेट का रूप ले चुकी है, जिसका सालाना कारोबार 200 करोड़ रुपये से भी अधिक का है। हाल ही में कुख्यात कारोबारी बाबू सिंधी के मामले ने इस पूरे सिंडिकेट की कार्यप्रणाली को उजागर कर दिया है, जो कृषि उपज की आड़ में इस काले धंधे को चला रहा था।
सूत्रों के अनुसार, धोलापाली के इस अवैध कारोबार से जुड़ा पूरा नेटवर्क अब केंद्रीय और राज्य की जांच एजेंसियों के निशाने पर है। एजेंसियों को शक है कि कई बड़े व्यापारी इस खेल में शामिल हैं। जल्द ही इन व्यापारियों से जुड़े गोदामों पर बड़े पैमाने पर जांच शुरू हो सकती है। इस जांच का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना होगा कि नीमच मंडी में कितना पोस्तादाना आया, व्यापारियों के पास कितना स्टॉक मौजूद है, और छनाई के बाद निकली धोलापाली को आखिर कहां खपाया गया। इस मिलान से पूरे रैकेट की परतें खुलने की उम्मीद है।
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धंधे का नेटवर्क और कार्यप्रणाली
यह अवैध कारोबार बेहद संगठित तरीके से चलाया जा रहा है। जानकारी के अनुसार, कुछ व्यापारियों ने धोलापाली को नष्ट करने के नाम पर विशेष भट्टियां तक बना रखी हैं, लेकिन वास्तव में वे इसे जलाते नहीं, बल्कि ऊंचे दामों पर बेच देते हैं। यह रैकेट सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, बंगाल और कोलकाता तक फैला हुआ है। इन राज्यों में नियमित बैठकें कर इस अवैध कारोबार को ऑपरेट किया जा रहा है। इस धंधे से जुड़े व्यापारी करोड़ों की अवैध संपत्ति अर्जित कर चुके हैं। पहले यह सिंडिकेट मुख्य रूप से बाबू सिंधी के नियंत्रण में था, परन्तु अब उसकी गिरफ्तारी के बाद कई नए खिलाड़ी इस अवैध खेल में अपनी जगह बना चुके हैं।
नीमच से लेकर बेंगलुरु तक अवैध व्यापार
सूत्र बताते हैं कि इस पूरे अवैध व्यापार में नीमच से जुड़े व्यापारी आशीष जिंदल, सुबोध भंसाली, महेंद्र गर्ग, श्री श्री सेशन इंटरनेशनल, भीलवाड़ा, आसिफ भाई बेंगलोर एवं इसके अतिरिक्त अन्य छोटे बड़े व्यापारी और है जो कि इस तरह के कार्य को अंजाम दे रहे हैं।
सरकारी उदासीनता और नीति का अभाव
इस पूरे गोरखधंधे की सबसे बड़ी जड़ राज्य सरकार की उदासीनता और धोलापाली को लेकर एक स्पष्ट नीति का अभाव है। पिछले 6 वर्षों से यह मामला अधर में लटका हुआ है। आज तक यह तय नहीं हो सका है कि पोस्तादाने की छनाई से निकलने वाली धोलापाली का क्या किया जाए,इसे जलाया जाए, जब्त किया जाए, या सरकार को सौंपा जाए?
इसलिए लाभ उठा रहे तस्कर
इस भ्रम का सीधा फायदा तस्कर उठा रहे हैं। तत्कालीन कलेक्टर कौशलेन्द्र विक्रम सिंह और प्रभारी मंत्री अर्चना चिटनिस के कार्यकाल में इस मुद्दे पर एक उच्च-स्तरीय बैठक भी हुई थी, जिसमें पुलिस, नारकोटिक्स और अन्य विभागों के अधिकारी शामिल थे। इसके बाद मंदसौर में भी आबकारी विभाग के प्रमुख सचिव और सॉल्टेक्स प्रतिनिधियों के साथ बैठक हुई, लेकिन नतीजा शून्य रहा। कोई भी ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका, जिससे तस्करों के हौसले बुलंद हैं।
समाधान की तत्काल आवश्यकता
यह स्पष्ट है कि धोलापाली के अवैध कारोबार का जाल दिन-ब-दिन गहराता जा रहा है और यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी एक गंभीर खतरा बन सकता है। अब यह जिम्मेदारी सरकार और जांच एजेंसियों की है कि वे इस रैकेट पर जल्द से जल्द नकेल कसें और इस काले कारोबार में शामिल दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करें। साथ ही, राज्य सरकार को तत्काल एक स्पष्ट और स्थायी नीति बनाकर इस समस्या का समाधान करना चाहिए, ताकि पोस्तादाने की आड़ में यह “काला सोना” देश की जड़ों को खोखला न कर सके।
ये कहना है नारकोटिक्स कमिश्नर का
नारकोटिक्स कमिश्नर, ग्वालियरदिनेश बौध का इस मामले में कहना है कि पोस्ता दाना जो छान रहा है वह अवैध है अगर कोई व्यापारी इस प्रकार काम कर रहा है तो इसकी सूचना नारकोटिक्स विभाग नीमच को दी जाएगी। उसके खिलाफ कार्यवाही की जाएगी।
नीमच से कमलेश सारड़ा की रिपोर्ट