राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने विदेश मंत्री एस जयशंकर के एक बयान पर कड़ा एतराज जताया है। जयशंकर ने सर्वदलीय बैठक में कहा था कि हम ‘दलाल राष्ट्र’ नहीं हैं। गहलोत ने इस टिप्पणी को अनुचित बताते हुए विदेश मंत्री से माफी मांगने की मांग की है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या शांति वार्ता में मध्यस्थता करना ‘दलाली’ होती है? गहलोत ने केंद्र सरकार की विदेश नीति और उसकी तैयारी पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं, खासकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के मद्देनजर।
अशोक गहलोत ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि अगर विदेश मंत्री से यह ‘स्लिप ऑफ टंग’ यानी जुबान फिसलने से हुआ है, तो इसे अलग तरीके से देखा जा सकता है। लेकिन, उन्होंने तुरंत ही इस बात पर जोर दिया कि विदेश मंत्री का पद बहुत गरिमापूर्ण और जिम्मेदार होता है। इस पद पर बैठे व्यक्ति के हर शब्द का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। गहलोत ने साफ तौर पर कहा,
“शांति वार्ता में मध्यस्थता कोई दलाली थोड़ी होती है?”
उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि दुनिया भर में देशों के बीच शांति और स्थिरता स्थापित करने के लिए मध्यस्थता के प्रयास बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, और उन्हें ‘दलाली’ जैसे शब्द से संबोधित करना न केवल अपमानजनक है, बल्कि राजनयिक मर्यादा के भी खिलाफ है। ऐसे शब्द वैश्विक मंच पर भारत की छवि को भी प्रभावित कर सकते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने विदेश मंत्री से सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग की। उन्होंने कहा कि देश के सर्वोच्च राजनयिकों में से एक होने के नाते, जयशंकर को ऐसे शब्दों का प्रयोग नहीं करना चाहिए था। गहलोत ने इस बात पर जोर दिया कि शांति बनाने के प्रयासों को हमेशा प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, न कि उन्हें ऐसे शब्दों से हतोत्साहित किया जाए। वर्तमान में खाड़ी क्षेत्र में जो तनावपूर्ण स्थितियां बनी हुई हैं, वे भारत और वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। इन स्थितियों के मद्देनजर, गहलोत ने याद दिलाया कि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने पहले ही सरकार को ऐसे संभावित संकटों के प्रति आगाह किया था। उनका इशारा था कि सरकार को अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखते हुए समय रहते ही आवश्यक रणनीतिक तैयारियां करनी चाहिए थीं, ताकि किसी भी अप्रत्याशित स्थिति का सामना किया जा सके।
गहलोत ने केंद्र सरकार की प्रतिक्रिया और तैयारी में हो रही देरी पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि
“सरकार हमेशा देरी कर देती है।”
उनकी राय में, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरते संकटों के लिए समय रहते तैयारी करना बेहद आवश्यक है। अगर सरकार ने युद्ध जैसी स्थिति बनने से पहले ही अपनी रणनीतिक और आर्थिक तैयारियां की होतीं, तो आज की अप्रत्याशित स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता था और इसके नकारात्मक प्रभावों को देश की जनता पर कम से कम पड़ने दिया जा सकता था। समय पर की गई तैयारी से देश को आर्थिक और सामाजिक दोनों मोर्चों पर मदद मिलती।
पूर्व मुख्यमंत्री ने तर्क दिया कि अगर सरकार ने समय पर तैयारी की होती, तो उसके पास मौजूदा हालात को जनता के सामने ‘जस्टिफाई’ करने का एक मजबूत आधार होता। सरकार यह कह सकती थी कि वह जनता को अंतरराष्ट्रीय संकट से होने वाली तकलीफों से राहत देने और कम से कम नुकसान हो, इसके लिए हर संभव प्रयास कर रही है। लेकिन, बिना पूर्व तैयारी के, सरकार के पास अपनी स्थिति को स्पष्ट करने का कोई ठोस आधार नहीं बचा। गहलोत ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि
“अब जो अंतरराष्ट्रीय स्थिति बनी हैं, वह किधर जाएगी कोई नहीं कह सकता?”
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसद में दिए गए उस बयान का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने स्थिति पर बात की थी, लेकिन साथ ही इस बात पर सवाल उठाया कि सरकार ने पहले से आवश्यक तैयारी क्यों नहीं की, और देश को ऐसे गंभीर हालात के लिए पहले से तैयार क्यों नहीं रखा गया।
विदेश मंत्री एस जयशंकर का मूल बयान
यह पूरा विवाद विदेश मंत्री एस जयशंकर द्वारा दिए गए एक बयान से पैदा हुआ है। दरअसल, सरकार ने बुधवार को पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर चर्चा के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक में सरकार की ओर से जानकारी दी गई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से बातचीत की है। प्रधानमंत्री ने ट्रंप से अपनी बातचीत में इस बात पर जोर दिया था कि पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध जल्द से जल्द खत्म होना चाहिए, क्योंकि इससे सभी देशों को भारी नुकसान हो रहा है, जिसमें भारत के आर्थिक हित भी शामिल हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, इसी सर्वदलीय बैठक में सरकार ने पश्चिम एशिया संघर्ष में कथित मध्यस्थता के संदर्भ में पाकिस्तान को ‘दलाल राष्ट्र’ करार दिया। सूत्रों के मुताबिक, विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस बैठक में कहा था कि इस मामले में पाकिस्तान के मध्यस्थता प्रयासों में कुछ भी नया नहीं है। जयशंकर ने ऐतिहासिक संदर्भ देते हुए कहा कि पाकिस्तान का 1981 से अमेरिका द्वारा ‘इस्तेमाल’ किया जा रहा है। उनके इस बयान का अर्थ यह था कि पाकिस्तान की विदेश नीति में स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता कम है और वह अक्सर बड़े देशों, विशेषकर अमेरिका, के हितों के लिए काम करता रहा है, बजाय इसके कि वह अपने स्वतंत्र राजनयिक प्रयासों से शांति स्थापित करे। यह टिप्पणी पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय भूमिका पर एक सीधा कटाक्ष थी।
जयशंकर के इस बयान ने राजनयिक हलकों में बहस छेड़ दी है। एक ओर जहां सरकार पाकिस्तान की ऐतिहासिक भूमिका को उजागर कर रही है और अपनी विदेश नीति की स्पष्टता दिखा रही है, वहीं दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जैसे अनुभवी नेता ऐसे शब्दों के इस्तेमाल पर सवाल उठा रहे हैं। गहलोत का मानना है कि ऐसे गंभीर मामलों में भाषा का संयम और राजनयिक मर्यादा बनाए रखना बेहद जरूरी है, खासकर जब देश एक शांतिपूर्ण समाधान की तलाश में हो। यह विवाद भारत की विदेश नीति की भाषा और उसके राजनयिकों द्वारा दिए गए बयानों के महत्व को रेखांकित करता है, साथ ही यह भी दर्शाता है कि विपक्षी दल सरकार की नीतियों पर किस तरह से नजर रख रहे हैं और अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं।






