शिवसेना यूबीटी के राज्यसभा सांसद संजय राउत ने ईरान युद्ध में मध्यस्थता को लेकर केंद्र सरकार के रवैये पर कड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर के उस बयान पर पलटवार किया, जिसमें पाकिस्तान की मध्यस्थता को ‘दलाली’ कहा गया था। राउत ने साफ कहा कि किसी गंभीर अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर मध्यस्थता को ‘दलाली’ नहीं, बल्कि ‘डिप्लोमेसी’ यानी कूटनीति कहते हैं।
दरअसल, यह पूरा मामला मिडिल ईस्ट युद्ध पर हुई सर्वदलीय बैठक से जुड़ा है। इस बैठक में विपक्षी दलों ने जब मध्यस्थता को लेकर पाकिस्तान से जुड़ा सवाल किया, तो विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा था कि भारत ‘दलाल देश’ नहीं हो सकता। इसी बयान के बाद संजय राउत की प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसमें उन्होंने ‘दलाल’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है और सरकार की नीति पर सवाल खड़े किए हैं।
मध्यस्थता के महत्व पर जोर दिया
राउत ने अपने बयान में मध्यस्थता के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ‘दलाल’ शब्द का इस्तेमाल सामान्य बोलचाल में ठीक हो सकता है, लेकिन जब बात अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी गंभीर मुद्दे पर देशों के बीच शांति स्थापित करने या समाधान खोजने की आती है, तो उसे दलाली नहीं कहा जा सकता। उनके मुताबिक, यह पूरी तरह से कूटनीति (डिप्लोमेसी) का हिस्सा है, जहां वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए राष्ट्र मिलकर काम करते हैं। कूटनीति में जटिल बातचीत, समझौते और विभिन्न पक्षों के हितों को संतुलित करना शामिल होता है, जिसका उद्देश्य युद्ध जैसे गंभीर संकटों को टालना या समाप्त करना होता है।
“एक युद्ध हो रहा है। जंग में हजारों लोग मारे जा रहे हैं। तेल और गैस के भंडारों पर बम पड़ रहे हैं। उसका खामियाजा पूरे विश्व को खासकर हमारे जैसे राष्ट्र को भुगतना पड़ रहा है। कोई न कोई तो मध्यस्थता करनी चाहिए थी।” (संजय राउत, राज्यसभा सांसद, शिवसेना यूबीटी)
संजय राउत ने मौजूदा युद्ध की भयावहता का जिक्र करते हुए मध्यस्थता की अनिवार्यता बताई। उन्होंने सुझाव दिया कि इस युद्ध को रोकने के लिए किसी न किसी को तो आगे आना ही चाहिए था। उन्होंने कहा कि चाहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों, रूस के राष्ट्रपति पुतिन हों, या चीन के राष्ट्रपति, किसी न किसी को मध्यस्थता करनी ही चाहिए थी। राउत ने सवाल किया कि अगर कोई मध्यस्थता नहीं करेगा, तो यह युद्ध कैसे रुकेगा और लोगों की जान कैसे बचेगी, जबकि इसका खामियाजा पूरी दुनिया, खासकर भारत जैसे देशों को भुगतना पड़ रहा है।
जानिए संजय राउत ने क्या कहा?
संजय राउत ने आगे कहा कि इस तरह के गंभीर वैश्विक मामलों में छोटे-छोटे देश भी अपना योगदान देना चाहते हैं, और भारत जैसा बड़ा देश तो इसमें अग्रणी भूमिका निभा सकता है। उनके मुताबिक, ऐसे समय में भारत को सबसे पहले आगे आकर मध्यस्थता करनी चाहिए थी। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत इतना महान देश है, जिसका पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के समय से ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक सम्मानजनक और सक्रिय स्थान रहा है। उस दौर में भारत ने कई वैश्विक संकटों में शांतिदूत की भूमिका निभाई है। राउत ने सवाल किया कि क्या भारत अब इस भूमिका से डर रहा है, इसलिए दूसरों को ‘दलाल’ कहकर पल्ला झाड़ रहा है?
“मध्यस्थता जिसे हमारे लोग दलाल बोलते हैं। भारत इतना महान देश है। पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी का आप इतिहास देखिए। आप डर रहे हो इसलिए दूसरे लोगों को आप दलाल बोल रहे हो। मैं पाकिस्तान की बात नहीं कर रहा हूं।” (संजय राउत, राज्यसभा सांसद, शिवसेना यूबीटी)
अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए, राउत ने सीधा सवाल किया कि क्या रूस के राष्ट्रपति पुतिन अगर मध्यस्थता करेंगे, तो उन्हें भी ‘दलाल’ कहा जाएगा? उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति और चीन के राष्ट्रपति का भी उदाहरण दिया। राउत ने पूछा कि क्या इन वैश्विक नेताओं की मध्यस्थता को भी ‘दलाली’ माना जाएगा? उन्होंने यहां तक कहा कि अगर इस तर्क को माना जाए, तो इसका मतलब है कि अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को भी ‘दलाल’ कहा जा रहा है, क्योंकि उन्होंने भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मध्यस्थता की भूमिका निभाई है।
राउत ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत और पाकिस्तान के बीच की गई मध्यस्थता का भी जिक्र किया। उन्होंने पूछा कि क्या तब ट्रंप ने ‘दलाली’ की थी? यह एक सीधा हमला था सरकार की उस परिभाषा पर, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को ‘दलाली’ करार दिया जा रहा है। राउत के मुताबिक, यह एक तरह से वैश्विक कूटनीति और लीडरशिप को कमजोर करने वाला बयान है।
शिवसेना यूबीटी सांसद ने सरकार के समर्थन में रहने की बात कही, लेकिन साथ ही प्रधानमंत्री की अनुपस्थिति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि इतनी बड़ी क्राइसिस को लेकर हुई बैठक में अगर प्रधानमंत्री नहीं आते हैं और संसदीय कार्यमंत्री जवाब देने लगते हैं, तो यह कौन सी नई रीत है? राउत ने इस बात पर चिंता जताई कि ऐसे गंभीर मुद्दे पर शीर्ष नेतृत्व की सीधी भागीदारी क्यों नहीं दिख रही है, जबकि यह एक ऐसा मामला है जिसका असर पूरे विश्व पर पड़ रहा है।






