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कैदी ने जेल से लिखा लेटर, राजस्थान हाई कोर्ट ने इसे याचिका माना फिर पैरोल पर सुनाया अहम फैसला

Written by:Atul Saxena
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राजस्थान हाईकोर्ट की डबल बेंच ने कहा कि पैरोल एक सुधारात्मक अधिकार है और इसे अमीरों का विशेषाधिकार नहीं बनाया जा सकता।
कैदी ने जेल से लिखा लेटर, राजस्थान हाई कोर्ट ने इसे याचिका माना फिर पैरोल पर सुनाया अहम फैसला

Rajasthan High Court

राजस्थान हाई कोर्ट ने एक कैदी द्वारा जेल से भेज गई चिट्ठी पर पैरोल को लेकर अहम् टिप्पणी की है और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है, अदालत ने इस चिट्ठी को जनहित याचिका मानते हुए गरीब कैदियों के लिए पैरोल के नियमों में बड़े बदलाव किए हैं और पूरे राज्य के लिए पैरोल पर नई गाइडलाइन जारी की है ।

राजस्थान हाई कोर्ट की मुख्य पीठ जोधपुर बेंच ने पैरोल प्रक्रिया को लेकर अहम् फैसला सुनाया है, दरअसल ये पूरा मामला सेन्ट्रल जेल जोधपुर में आजीवन कारावास की सजा काट रह कैदी खरताराम ने जेल से ही लिखी एक चिट्ठी से जुड़ा है जिसे अदालत ने जनहित याचिका मानते हुए पैरोल प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण दिशा निर्देश जारी किये हैं, अदालत ने कहा गरीबी कोई अपराध नहीं है और पैरोल अमीरों का विशेषाधिकार नहीं हो सकती, कोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य में पैरोल पर रिहाई के लिए बॉन्ड की शर्त तय करते समय कैदी की आर्थिक स्थिति को प्राथमिकता दी जाए।

पैरोल कमेटी की शर्तों के खिलाफ कैदी ने ली अदालत की शरण 

बता दें खरताराम को हत्या के एक मामले में 2014 में अदालत ने उम्र कैद की सजा सुनाई थी, 2025 में जिला पैरोल समिति ने उसे चौथी बार 40 दिन की नियमित पैरोल मंजूर की लेकिन साथ ही 25-25 हजार रुपये के 2 जमानती पेश करने की शर्त भी इसमें लगाई, आर्थिक रूप से कमजोर खरताराम इस शर्त को पूरी करने में असमर्थ था तो उसने हाई कोर्ट को पोस्टकार्ड भेजकर अपनी व्यथा सुनाई।

कैदी की चिट्ठी को हाई कोर्ट ने माना जनहित याचिका 

हाई कोर्ट के पास जब ये चिट्ठी पहुंची तो उसने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया और जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस फरजंद अली की खंडपीठ में इसकी सुनवाई हुई, कोर्ट ने जब खरताराम के मामले की जाँच की तो मालूम चला कि उसे पहली भी तीन बार पैरोल मिल चुकी है और उसमें भी यही शर्तें थीं, उसे 2019 में 2020 में और 2022 में भी पैरोल मिला था लेकिन तब भी अधिकारियों ने ऐसी ही शर्तें थोपी थीं। पिछली तीन बार भी हाई कोर्ट ने दखल देकर उसे निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश दिया था।

पैरोल प्रक्रिया को अदालत ने कहा चिंताजनक 

कोर्ट ने जब पूरा मामला देखा तो पैरोल पर एक बार फिर पुरानी ही शर्तें दोहराने पर आपत्ति जताई और अधिकारियों के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई,डबल बेंच ने कहा कि यह चिंताजनक और दुर्भाग्यपूर्ण पैटर्न है जो सिस्टम की उदासीनता को दर्शाता है अदालत ने कहा यदि कोई कैदी गरीब है, आर्थिक रूप से कमजोर है जमानत की बड़ी राशि नहीं भर सकता ऐसे में उस पर ऐसी शर्ते थोपना उसे पैरोल से वंचित करने जैसा होगा।

कोर्ट ने सुनाया ये अहम फैसला, नई गाइड लाइन दी 

जस्टिस मोंगा ने टिप्पणी की कि पैरोल एक सुधारात्मक अधिकार है और इसे अमीरों का विशेषाधिकार नहीं बनाया जा सकता। बेंच ने पैरोल कमेटी के आदेश को रद्द करते हुए खरताराम को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके पर पैरोल पर रिहा करने का निर्देश दिया साथ ही प्रदेशभर में गरीब कैदियों के लिए पैरोल प्रक्रिया को मानवीय और न्यायसंगत बनाने के लिए गाइडलाइन जारी की। कोर्ट ने कहा कि किसी भी कैदी की आर्थिक स्थिति देखकर ही उसके बॉन्ड की शर्त तय की जानी चाहिए, कोर्ट के इस आदेश से गरीब और आर्थिक रूप से कमजोर कैदियों को बड़ी राहत मिलेगी।

Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
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