फाल्गुन का महीना आते ही मौसम में रंग घुलने लगते हैं। हवा में होली की खुशबू होती है और मंदिरों में राधा-कृष्ण के भजन गूंजने लगते हैं। इसी पावन समय में आती है डोल पूर्णिमा, जिसे डोल यात्रा या डोल उत्सव भी कहा जाता है। यह सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और उल्लास का प्रतीक है।
डोल पूर्णिमा का नाम सुनते ही झूले में विराजमान राधा-कृष्ण की सुंदर छवि मन में उभरती है। इस दिन भक्त भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी को डोली में झुलाते हैं, अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं और भजन-कीर्तन के साथ उत्सव मनाते हैं। आइए जानते हैं डोल पूर्णिमा 2026 की सही तारीख, पूजा विधि और इसका धार्मिक महत्व।
डोल पूर्णिमा 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
हिंदू पंचांग के अनुसार डोल पूर्णिमा फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को मनाई जाती है। दृक पंचांग के मुताबिक वर्ष 2026 में फाल्गुन पूर्णिमा 2 मार्च को शाम 5 बजकर 55 मिनट से शुरू होगी। यह तिथि 3 मार्च 2026 को शाम 5 बजकर 06 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि को मानने की परंपरा के अनुसार अधिकांश लोग 3 मार्च 2026 को डोल पूर्णिमा मनाएंगे। इस दिन सुबह से ही मंदिरों में विशेष पूजा और झूला उत्सव की तैयारी शुरू हो जाएगी।
डोल पूर्णिमा का पौराणिक महत्व
डोल पूर्णिमा भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के दिव्य प्रेम को समर्पित है। मान्यता है कि इसी दिन भगवान कृष्ण ने राधा जी के प्रति अपने प्रेम को प्रकट किया था। कथा के अनुसार राधा रानी जब अपनी सखियों के साथ झूला झूल रही थीं, तब कान्हा ने प्रेम स्वरूप उनके चेहरे पर गुलाल लगाया था।
‘डोल’ शब्द का अर्थ है पालकी या झूला। इसी कारण इस उत्सव को डोल यात्रा कहा जाता है। यह दिन हमें प्रेम, स्नेह और भक्ति का संदेश देता है। इसलिए डोल पूर्णिमा पर सूखे अबीर-गुलाल का विशेष महत्व होता है। कई जगह इसे श्री चैतन्य महाप्रभु के जन्मोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। इस तरह डोल पूर्णिमा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
डोल पूर्णिमा कैसे मनाई जाती है
डोल पूर्णिमा के दिन भक्त सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करते हैं और पूजा की तैयारी करते हैं। मंदिरों में राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं को सुंदर वस्त्र और फूलों से सजाया जाता है। इसके बाद उन्हें डोली या झूले में विराजमान किया जाता है।
भक्त नाचते-गाते, भजन-कीर्तन करते हुए डोल यात्रा निकालते हैं। यात्रा के दौरान “होरी बोल” और “राधे-कृष्ण” के जयकारे लगाए जाते हैं। लोग एक-दूसरे को गुलाल लगाकर प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हैं। इस दिन गीले रंगों की बजाय सूखे अबीर-गुलाल का अधिक उपयोग किया जाता है। कई स्थानों पर पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ शोभायात्रा निकाली जाती है।
पश्चिम बंगाल, ओडिशा और अन्य राज्यों में डोल पूर्णिमा
डोल पूर्णिमा खासतौर पर पश्चिम बंगाल, ओडिशा, त्रिपुरा और असम में बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। ओडिशा में इसे ‘डोला मेला’ कहा जाता है। यहां अलग-अलग गांवों से भगवान की पालकियां एक स्थान पर लाई जाती हैं और सामूहिक उत्सव होता है।
पश्चिम बंगाल में यह दिन श्री चैतन्य महाप्रभु की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। मंदिरों और मठों में विशेष कीर्तन होते हैं। गुजरात और राजस्थान के कृष्ण मंदिरों में भी डोल उत्सव की धूम रहती है। डोल पूर्णिमा का यह पर्व लोगों को एक साथ जोड़ता है और समाज में प्रेम और एकता का संदेश फैलाता है।
डोल पूर्णिमा 2026 पूजा विधि
डोल पूर्णिमा के दिन घर या मंदिर में एक साफ स्थान पर चौकी स्थापित करें। उस पर सुंदर कपड़ा बिछाकर राधा-कृष्ण की प्रतिमा रखें। यदि संभव हो तो एक छोटी पालकी या झूला भी स्थापित करें।
सबसे पहले सूर्य देव को जल अर्पित करें। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी को अबीर-गुलाल अर्पित करें। माखन-मिश्री का भोग लगाएं। मालपुए या अन्य मिठाई भी अर्पित की जा सकती है। पूजन के अंत में राधा-कृष्ण को झूले में झुलाएं और आरती करें। इसके बाद प्रसाद बांटें।
डोल पूर्णिमा व्रत के नियम
कुछ भक्त डोल पूर्णिमा पर व्रत भी रखते हैं। व्रत रखने वाले व्यक्ति को सुबह स्नान कर संकल्प लेना चाहिए। दिनभर सात्विक भोजन करना चाहिए या फलाहार रखना चाहिए। पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण कर व्रत खोला जाता है। व्रत का मुख्य उद्देश्य मन और आत्मा को शुद्ध करना और भगवान श्रीकृष्ण के प्रति प्रेम बढ़ाना है।
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