मंगलवार को मध्यप्रदेश के उज्जैन में सिलीगुड़ी की छात्रा भारती चैतन्य ने भी संन्यास ले लिया है। दरअसल अनुष्ठान के बाद उनका नया नाम साध्वी रीत प्रज्ञानंद गिरी रखा गया है। बता दें कि यह दीक्षा गंगाघाट पर मोनी तीर्थ पीठाधीश्वर सुमनाजी महाराज ने विधि-विधान के साथ दी है। वहीं संन्यास की यह पूरी प्रक्रिया करीब दो घंटे तक चली। इस दौरान पहले धार्मिक विधियां पूरी की गईं फिर बाल मुंडवाने की रस्म निभाई गई। इसके बाद माता-पिता के पिंडदान की प्रक्रिया भी पूरी की गई, जो संन्यास की परंपरा का अहम हिस्सा मानी जाती है।
दरअसल युवती ने खुद का भी पिंडदान भी किया, जो सांसारिक जीवन से पूरी तरह अलग होने का प्रतीक माना जाता है। जानकारी दें कि मोनी आश्रम में तीन दिन के भीतर यह दूसरी घटना है जब किसी युवती ने औपचारिक रूप से संन्यास लेकर साध्वी का जीवन अपनाया है।
क्या है संन्यास की परंपरा?
बता दें कि हिंदू परंपरा में संन्यास को जीवन के सबसे कठिन और अनुशासित रास्तों में से एक माना गया है। दरअसल इसमें व्यक्ति अपने पुराने जीवन, परिवार और निजी पहचान से दूरी बनाकर पूरी तरह आध्यात्मिक जीवन अपनाता है। उज्जैन जैसे धार्मिक शहरों में इस तरह की दीक्षा की परंपरा लंबे समय से चलती आ रही है। वहीं भारती चैतन्य को दीक्षा देने वाले सुमनाजी महाराज ने विधि-विधान के साथ सभी धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी कराईं है। इस दौरान गंगाघाट पर पूजा, मंत्रोच्चार और अन्य अनुष्ठान किए गए। संन्यास लेने वाले व्यक्ति के लिए बाल मुंडवाना, पिंडदान और नया नाम ग्रहण करना बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
पढ़ाई जारी रखेंगी नई साध्वी
दरअसल संन्यास लेने के बाद भी नई साध्वी अपनी पढ़ाई जारी रखेंगी। उन्होंने बताया कि उन्हें शुरू से ही धर्म और शास्त्रों में खास रुचि रही है। ग्रेजुएशन के बाद वे संस्कृत और धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर रही हैं। इससे पहले वे दिल्ली, वाराणसी और हरिद्वार में रहकर पढ़ाई कर चुकी हैं। वहीं उनका कहना है कि अभी शास्त्रों का ज्ञान अधूरा है इसलिए आगे की पढ़ाई पूरी करना जरूरी है। इसी वजह से वे जल्द ही वाराणसी जाएंगी जहां धर्म और दर्शन से जुड़े विषयों की पढ़ाई करेंगी। हालांकि पढ़ाई पूरी करने के बाद वे दोबारा उज्जैन लौटेंगी और मोनी आश्रम में रहकर धर्म से जुड़े काम करेंगी।
इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि संन्यास लेने का फैसला किसी दबाव में नहीं लिया गया है बल्कि यह उनका खुद का निर्णय है। उनका मानना है कि जीवन का उद्देश्य सिर्फ व्यक्तिगत सफलता नहीं बल्कि समाज और दुनिया के कल्याण के लिए काम करना भी है।






