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महाकाल मंदिर में शुरू होगी शीतल जलधारा, दो माह तक गलंतिका बंधन से मिलेगी भगवान को ठंडक

Written by:Bhawna Choubey
Published:
उज्जैन महाकाल मंदिर में भीषण गर्मी से भगवान को राहत देने के लिए शुरू होगी शीतल जलधारा 3 अप्रैल से गलंतिका बंधन की परंपरा, जानिए इसका धार्मिक महत्व और क्यों किया जाता है यह खास अनुष्ठान।
महाकाल मंदिर में शुरू होगी शीतल जलधारा, दो माह तक गलंतिका बंधन से मिलेगी भगवान को ठंडक

गर्मी का मौसम जैसे-जैसे तेज होता है, वैसे-वैसे भगवान के भक्तों की आस्था भी अपने अलग रूप में नजर आने लगती है। उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में हर साल एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जो सिर्फ पूजा नहीं बल्कि भगवान के प्रति भाव और सेवा का प्रतीक है।

इस बार भी वैशाख और ज्येष्ठ मास की गर्मी में भगवान महाकाल को ठंडक देने के लिए शीतल जलधारा प्रवाहित की जाएगी। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और हर साल श्रद्धालु इसे बड़े भाव से निभाते हैं।

3 अप्रैल से शुरू होगा गलंतिका बंधन

महाकाल मंदिर में इस विशेष अनुष्ठान की शुरुआत 3 अप्रैल 2026 से होगी। यह क्रम वैशाख कृष्ण प्रतिपदा से शुरू होकर ज्येष्ठ पूर्णिमा तक पूरे दो महीने तक चलेगा। इस दौरान भगवान महाकाल के शीश पर मिट्टी की मटिकयों के जरिए लगातार ठंडा जल अर्पित किया जाएगा। इस प्रक्रिया को ‘गलंतिका बंधन’ कहा जाता है। पुजारी पहले पवित्र नदियों का आह्वान करते हैं और फिर विधि-विधान से भगवान के शीश पर गलंतिका बांधते हैं। इसके बाद पूरे दिन निर्धारित समय तक जलधारा प्रवाहित होती रहती है।

क्या है गलंतिका बंधन और इसकी परंपरा

गलंतिका बंधन एक प्राचीन धार्मिक परंपरा है, जिसमें मिट्टी के घड़ों यानी मटिकयों में जल भरकर भगवान शिव के ऊपर धीरे-धीरे जल गिराया जाता है। यह जलधारा भगवान को ठंडक पहुंचाने के उद्देश्य से की जाती है। गर्मी के दिनों में यह अनुष्ठान विशेष महत्व रखता है। महाकाल मंदिर में यह परंपरा बहुत नियमों और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है, जिसमें हर दिन भक्तों की बड़ी संख्या शामिल होती है।

समुद्र मंथन से जुड़ी है मान्यता

इस परंपरा के पीछे एक पौराणिक कथा भी जुड़ी हुई है। मान्यता है कि जब समुद्र मंथन हुआ था, तब 14 रत्नों के साथ कालकूट विष भी निकला था। यह विष इतना खतरनाक था कि पूरी सृष्टि के लिए खतरा बन गया था। तब भगवान शिव ने इस विष को पीकर अपने कंठ में धारण कर लिया। विष की गर्मी को शांत करने के लिए भगवान को जल अर्पित किया जाता है। इसी मान्यता के चलते वैशाख और ज्येष्ठ मास में शीतल जलधारा प्रवाहित करने की परंपरा शुरू हुई।

वैशाख मास में स्नान और दान का महत्व

महाकाल मंदिर में गलंतिका बंधन के साथ-साथ वैशाख मास में स्नान और दान का भी विशेष महत्व होता है। श्रद्धालु शिप्रा नदी में स्नान करते हैं और इसके बाद दान-पुण्य करते हैं। इस महीने में पानी का दान, पक्षियों के लिए दाना-पानी रखना और जरूरतमंदों की मदद करना बहुत पुण्यदायी माना जाता है।

Bhawna Choubey
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मुझे लगता है कि कलम में बहुत ताकत होती है और खबरें हमेशा सच सामने लाती हैं। इसी सच्चाई को सीखने और समझने के लिए मैं रोज़ाना पत्रकारिता के नए पहलुओं को सीखती हूँ। View all posts by Bhawna Choubey
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