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बिजली तार चोरी के 10 महीने बाद पुलिस ने दर्ज की FIR, सरकारी विभागों की सुस्ती पर उठे गंभीर सवाल

Reported by:Brijesh Shrivastav|Edited by:Gaurav Sharma
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मध्य प्रदेश के उमरिया जिले में सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने वाला मामला सामने आया है, जहां बिजली की 11 केवी तार चोरी होने के 10 महीने बाद FIR दर्ज की गई है। अप्रैल 2025 की इस घटना पर फरवरी 2026 में कार्रवाई हुई, जिससे बिजली विभाग और पुलिस के बीच समन्वय की कमी उजागर हुई है।
बिजली तार चोरी के 10 महीने बाद पुलिस ने दर्ज की FIR, सरकारी विभागों की सुस्ती पर उठे गंभीर सवाल

उमरिया: मध्य प्रदेश के उमरिया जिले से सरकारी तंत्र की सुस्ती का एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां बिजली की 11 केवी लाइन की चोरी की घटना के करीब 10 महीने बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। इस लंबी देरी ने पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया और विभागों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह मामला इंदवार थाना क्षेत्र के पनपथा फीडर कसेरू रोड का है। जानकारी के अनुसार, 22 अप्रैल 2025 को कंपनी द्वारा लगाए गए बिजली के खंभों से 11 केवी की तीन फेस वाली तार चोरी हो गई थी। यह एक महत्वपूर्ण लाइन थी, जिसका सीधा संबंध क्षेत्र की बिजली आपूर्ति से है।

आखिर 10 महीने क्यों लग गए?

सार्वजनिक संपत्ति की चोरी के बावजूद इस मामले में एफआईआर दर्ज होने में लगभग 300 दिन लग गए। आखिरकार 21 फरवरी 2026 को इंदवार थाने में भारतीय न्याय संहिता की धारा 303(2) के तहत अज्ञात आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। सवाल यह है कि जब घटना अप्रैल 2025 में हुई, तो कानूनी प्रक्रिया शुरू होने में इतना लंबा वक्त क्यों लगा?

विभाग और पुलिस के अपने-अपने दावे

इस मामले में बिजली विभाग और पुलिस के बयान विरोधाभासी लग रहे हैं। बिजली विभाग के कनिष्ठ अभियंता आर.के. जायसवाल का कहना है कि विभाग ने घटना की सूचना तत्काल थाना इंदवार को दे दी थी। यदि उनका दावा सही है, तो यह मामला और भी गंभीर हो जाता है।

वहीं, थाना प्रभारी का कहना है कि जांच के बाद मामला कायम किया गया है। लेकिन इस बयान से यह स्पष्ट नहीं होता कि जांच आखिर शुरू कब हुई थी। क्या सूचना मिलने के बाद से ही जांच चल रही थी या फिर मामला सिर्फ कागजों में सिमट कर रह गया था?

क्या अब मिल पाएंगे सबूत और आरोपी?

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी लंबी देरी से जांच पर प्रतिकूल असर पड़ना तय है। 10 महीने के अंतराल में घटनास्थल से भौतिक साक्ष्य नष्ट हो जाते हैं और आरोपियों तक पहुंचना बेहद मुश्किल हो जाता है। स्थानीय लोग पूछ रहे हैं कि अगर शुरुआत में ही तत्परता दिखाई जाती तो शायद चोरों को पकड़ा जा सकता था।

फिलहाल, मामला तो दर्ज हो गया है, लेकिन यह घटना सिर्फ तार चोरी की नहीं, बल्कि सरकारी विभागों के बीच समन्वय की कमी और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा के प्रति उनकी गंभीरता को भी उजागर करती है। अब देखना यह होगा कि इस मामले की जांच किसी नतीजे पर पहुंचती है या यह भी फाइलों में दबकर रह जाती है।

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Gaurav Sharma
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