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जनसुनवाई से उठा ग्रामीणों का विश्वास, आवेदनों पर नहीं होती कार्रवाई, सिर्फ मिलता है आश्वासन

Reported by:Brijesh Shrivastav|Edited by:Atul Saxena
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जनता का सवाल सीधा है, क्या हर आवेदन की स्पष्ट समयसीमा तय है? क्या आवेदक को यह बताया जाता है कि उसका मामला किस स्तर पर लंबित है? क्या निराकरण की सूची सार्वजनिक की जाती है?
जनसुनवाई से उठा ग्रामीणों का विश्वास, आवेदनों पर नहीं होती कार्रवाई, सिर्फ मिलता है आश्वासन

Jansunwai complaint Umaria Collectorate

उमरिया कलेक्ट्रेट में हर मंगलवार आयोजित होने वाली जनसुनवाई कभी लोगों के लिए सीधी राहत का दरवाजा मानी जाती थी। सुबह से ही परिसर में भीड़ रहती थी, हाथों में आवेदन और मन में उम्मीद। लेकिन अब चर्चा इस बात की है कि क्या यह मंच सिर्फ आवेदन लेने तक सीमित होता जा रहा है?

जनसंपर्क द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक 6 जनवरी 2026 को 45 आवेदन, 13 जनवरी को 58, 20 जनवरी को 69, 3 फरवरी को 53, 10 फरवरी को 41, 17 फरवरी को 54 आवेदन और  24 फरवरी को 46 आवेदन दर्ज हुए। संख्या में उतार चढ़ाव है, लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितनों का समयबद्ध निराकरण हुआ? आवेदन दर्ज होना एक बात है, समाधान मिलना दूसरी।

भाजपा नेता भी उठा रहे सवाल

खास बात ये है कि भाजपा नेता तक जनसुवाई पर सवाल उठा रहे हैं, भाजपा नेता का कहना है कि दो मंगलवार उमरिया कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में आवेदन दे चुके हैं, लेकिन उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला। उनका बयान इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वे सत्ताधारी दल से जुड़े पदाधिकारी हैं और स्थानीय स्तर पर राजनीतिक वजन रखते हैं। उनका सीधा सवाल है कि अगर सत्ता पक्ष के कार्यकर्ताओं के आवेदन लंबित हैं, तो आम जनता की सुनवाई कितनी गंभीरता से हो रही होगी?

पहले होती थी भीड़, अब उपस्थिति कम 

पहले जनसुनवाई के दौरान कलेक्ट्रेट परिसर में भारी भीड़ दिखाई देती थी, लेकिन अब उपस्थिति कम हो रही है। क्या यह समस्याओं के कम होने का संकेत है या लोगों के भरोसे में कमी का? वहीं संयुक्त कलेक्टर अमित सिंह का पक्ष अलग है। उनका कहना है कि पर्याप्त संख्या में आवेदन आते हैं और कई मामले न्यायालयीन प्रकृति के होते हैं, जिनका तत्काल समाधान संभव नहीं। एसडीएम या तहसीलदार कोर्ट से जुड़े मामलों में प्रक्रिया का पालन जरूरी है। कुछ आवेदन विकास कार्यों से जुड़े होते हैं, जिनमें बजट और प्रशासनिक स्वीकृति का प्रश्न रहता है। संबंधित आवेदन को विभागों को भेजकर रिपोर्ट मंगाने की बात भी कही गई है।

जनता पूछ रही सवाल 

लेकिन जनता का सवाल सीधा है, क्या हर आवेदन की स्पष्ट समयसीमा तय है? क्या आवेदक को यह बताया जाता है कि उसका मामला किस स्तर पर लंबित है? क्या निराकरण की सूची सार्वजनिक की जाती है? प्रदेश सरकार सुशासन और जवाबदेही की बात करती है उमरिया कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई उसी दावे की जमीनी परीक्षा है। यदि आवेदन सिर्फ फाइलों में घूमते रहें और समाधान की रफ्तार धीमी हो, तो संदेश ऊपर तक जाता है।

जनसुनवाई का उद्देश्य केवल सुनना नहीं, समाधान देना है। उमरिया में अब बहस आवेदन की संख्या पर नहीं, भरोसे की स्थिति पर हो रही है। प्रशासन के सामने चुनौती साफ है, भरोसा बनाए रखना है तो परिणाम दिखाने होंगे।

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Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
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