माघ मेले में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य पद को लेकर विवादों में घिरे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की मुश्किलें बढ़ गई हैं। मेला प्रशासन ने उन्हें 48 घंटे के भीतर दूसरा नोटिस भेजकर पूछा है कि उन्हें मेले से हमेशा के लिए प्रतिबंधित क्यों न कर दिया जाए। प्रशासन ने उन पर मौनी अमावस्या के दिन सुरक्षा व्यवस्था भंग करने और भगदड़ जैसी स्थिति पैदा करने का गंभीर आरोप लगाया है।
नोटिस के अनुसार, मौनी अमावस्या के दिन जब संगम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ थी, तब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने बिना अनुमति बग्घी के साथ जाने की कोशिश की। आरोप है कि इस दौरान उन्होंने इमरजेंसी के लिए आरक्षित पांटून पुल पर लगा बैरियर भी तोड़ दिया। प्रशासन का कहना है कि उनके इस कृत्य से व्यवस्था छिन्न-भिन्न हुई और भगदड़ का गंभीर खतरा पैदा हो गया था।
मेला प्रशासन ने चेतावनी दी है कि अगर 24 घंटे के भीतर संतोषजनक जवाब नहीं मिला, तो उनके शिविर को दी गई जमीन और अन्य सुविधाएं रद्द कर दी जाएंगी। साथ ही भविष्य में उनके मेला क्षेत्र में प्रवेश पर भी रोक लगाई जा सकती है।
क्या है पूरा विवाद?
यह पूरा विवाद 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन शुरू हुआ था। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी पर बैठकर संगम स्नान के लिए जा रहे थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें सुरक्षा कारणों से रोककर पैदल जाने को कहा। इस पर उनके शिष्यों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की हो गई, जिसके बाद अविमुक्तेश्वरानंद अपने शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए थे।
इसके बाद प्रशासन ने उन्हें पहला नोटिस भेजकर ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य की पदवी इस्तेमाल करने पर सवाल उठाया था, क्योंकि यह मामला कोर्ट में विचाराधीन है। इस पर अविमुक्तेश्वरानंद ने 8 पन्नों का जवाब भेजकर प्रशासन पर ही मानहानि का केस करने की चेतावनी दे डाली थी।
विवाद में कूदे संत और सियासतदान
यह मामला अब धार्मिक और राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। एक तरफ जहां समाजवादी पार्टी खुलकर अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में आ गई है, वहीं संत समाज भी इस मुद्दे पर बंटा हुआ नजर आ रहा है।
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अविमुक्तेश्वरानंद से फोन पर बात की और नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय को उनसे मिलने भेजा। पांडेय ने इसे संत का अपमान बताते हुए मामला विधानसभा में उठाने की बात कही।
“सरकार सनातन धर्म की बात तो करती है, लेकिन एक संत के अपमान पर चुप है। यह मामला किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है।” — माता प्रसाद पांडेय, नेता प्रतिपक्ष
वहीं, द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद महाराज और पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने अविमुक्तेश्वरानंद का समर्थन किया है। स्वामी सदानंद ने कहा कि प्रशासन को माफी मांगनी चाहिए। हालांकि, जगद्गुरु रामभद्राचार्य ने प्रशासन की कार्रवाई को सही ठहराया।
“अविमुक्तेश्वरानंद के साथ अन्याय नहीं हुआ। अन्याय तो उन्होंने किया है। स्नान के लिए गंगा तक पालकी से जाने का नियम नहीं है। हम लोग भी पैदल ही जाते हैं।” — जगद्गुरु रामभद्राचार्य
शंकराचार्य पद पर कानूनी लड़ाई
इस विवाद के मूल में ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य की पदवी है। स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद अविमुक्तेश्वरानंद और वासुदेवानंद के बीच पद को लेकर विवाद चल रहा है, जो न्यायालय में विचाराधीन है। प्रशासन ने इसी आधार पर उनके द्वारा ‘शंकराचार्य’ लिखने पर आपत्ति जताई है, जिसे वह कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन मान रहा है। वहीं, अविमुक्तेश्वरानंद का दावा है कि उनके गुरु ने उन्हें वसीयत के जरिए उत्तराधिकारी नियुक्त किया था और उनका विधिवत पट्टाभिषेक हो चुका है।





