वृंदावन: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को उत्तर प्रदेश के वृंदावन में अवैध घुसपैठ और जनसंख्या असंतुलन पर गहरी चिंता व्यक्त की। रुक्मिणी विहार स्थित जीवनदीप आश्रम के लोकार्पण समारोह में उन्होंने लोगों से आग्रह किया कि वे घुसपैठियों पर कड़ी नजर रखें और यह सुनिश्चित करें कि उन्हें देश में कोई रोजगार न मिले। इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और यूपी के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक भी मौजूद थे।
भागवत ने कहा कि देश की सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने के लिए यह आवश्यक है कि अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान कर अधिकारियों को सूचित किया जाए।
जनसंख्या नीति पर पुनर्विचार की जरूरत
आरएसएस प्रमुख ने देश की जनसंख्या नीति पर फिर से विचार करने की वकालत की। उन्होंने तीन बच्चों की नीति पर जोर देते हुए कहा कि यह केवल संख्या बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि परिवार और समाज के बेहतर स्वास्थ्य के लिए भी जरूरी है।
“डॉक्टर अच्छी पारिवारिक सेहत के लिए तीन बच्चों की सलाह देते हैं, क्योंकि बचपन की बातचीत लोगों को सोशल स्किल्स और ग्रुप में एडजस्ट करने की क्षमता डेवलप करने में मदद करती है।”- मोहन भागवत
उन्होंने जनसंख्या अध्ययनों का हवाला देते हुए चेतावनी दी कि तीन से कम की प्रजनन दर किसी भी समाज के लिए लंबे समय में खतरा पैदा करती है। भागवत ने स्पष्ट किया कि कानून बनाने से पहले लोगों में इस विषय पर समझ विकसित करना अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि मानवता की दृष्टि से परिवारों को दो की जगह तीन बच्चे पैदा करने का लक्ष्य रखना चाहिए।
जबरन धर्मांतरण और घर वापसी पर बोले
मोहन भागवत ने जबरन कराए जा रहे धर्म परिवर्तन को समाप्त करने का भी आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कानून अपनी जगह है, लेकिन इस सामाजिक बुराई को समाज को ही मिलकर रोकना होगा।
उन्होंने कहा, “जो लोग दूसरे धर्मों में चले गए हैं, वे हिंदुओं के ही वंशज हैं और अगर वे वापस लौटना चाहते हैं तो उनका स्वागत किया जाना चाहिए।”
भारत का मॉडल दुनिया के लिए मिसाल
अपने संबोधन में भागवत ने अमेरिका और चीन जैसे देशों की आक्रामक नीतियों की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ये देश अपने आर्थिक मॉडल को दूसरों पर थोपना चाहते हैं, जबकि भारत का दृष्टिकोण समावेशी है।
उन्होंने कहा, “भारत का तरीका दूसरों पर कुछ भी थोपने का नहीं है, यह मानता है कि सभी का नजरिया सही हो सकता है। हमारा मॉडल नैतिक व्यवहार पर जोर देता है, जिससे वैश्विक समुदाय सीख सकता है।”
भागवत ने आश्रमों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि ये केवल पेट भरने की शिक्षा नहीं देते, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने वाला सच्चा ज्ञान प्रदान करते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सनातन धर्म और भारत के प्राचीन सांस्कृतिक मूल्य आज की अशांत दुनिया के लिए भी प्रासंगिक हैं।






