बस्ती, पूर्वांचल का प्रवेश द्वार कहा जाने वाला यह जनपद एक बार फिर राजनीतिक अखाड़े में तब्दील हो गया है। आज यहां जीआईसी मैदान में ब्राह्मण समाज को एकजुट करने के लिए पूर्वांचल के कई बाहुबली ब्राह्मण नेता एक साथ मंच पर पहुंचे। इस कार्यक्रम को ‘सनातन संवाद’ नाम दिया गया, जिसका नेतृत्व जगद्गुरु शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने किया। मंच से योगी सरकार के खिलाफ जोरदार हुंकार भरी गई और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर कई गंभीर आरोप लगाए गए। शंकराचार्य ने सनातनियों से आने वाले चुनाव में एकजुट होकर मतदान करने की भावुक अपील भी की।

बस्ती का जीआईसी मैदान, जो पहले भी कई ऐतिहासिक राजनीतिक घटनाओं का गवाह रहा है, आज एक बार फिर इतिहास का हिस्सा बन गया। शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने इसी मंच से योगी सरकार के खिलाफ बिगुल फूंका। उन्होंने अपने संबोधन में सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए और सनातन धर्म के सिद्धांतों की अनदेखी का आरोप लगाया। इस कार्यक्रम में मंच पर मौजूद योगी आदित्यनाथ के धुर विरोधी पूर्व विधायक विनय शंकर तिवारी ने तो खुले तौर पर ब्राह्मण समाज से आह्वान किया कि अब वे एकजुट हो जाएं। उन्होंने कहा कि अहंकारी और अधर्मी सनातन विरोधी सरकार को इस बार फरसा उठाकर सत्ता से उखाड़ फेंकना होगा। यह बयान सीधे तौर पर भाजपा सरकार को एक बड़ी राजनीतिक चुनौती देता दिखा।

अब ब्राह्मण सुदामा नहीं बल्कि परशुराम है- अलंकार अग्निहोत्री

कार्यक्रम में पूर्व पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री ने भी जनता को संबोधित किया। अपने संबोधन में उन्होंने ब्राह्मण समाज में नए जोश का संचार करने का प्रयास किया। उन्होंने पुरजोर तरीके से यह बात रखी कि ब्राह्मण जरूरत पड़ने पर फरसा भी उठा सकता है। अग्निहोत्री ने कहा कि अब ब्राह्मण सुदामा नहीं बल्कि परशुराम है, जो अन्याय के खिलाफ खड़ा होने से हिचकेगा नहीं। अलंकार अग्निहोत्री ने ‘हर घर फरसा घर घर फरसा’ का नारा देकर वहां मौजूद ब्राह्मणों में एक नया जोश भरने का काम किया। यह नारा सीधे तौर पर ब्राह्मणों को राजनीतिक रूप से सक्रिय और आक्रामक होने का संदेश देता है, जिससे आने वाले चुनाव में समाज की एकजुटता का प्रदर्शन किया जा सके।

ब्राह्मणों ने भरी हुंकार, योगी सरकार पर साधा निशाना

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर काफी गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि अगर वर्तमान भाजपा सरकार वाकई गाय और सनातन की बात करती, तो विपक्ष को कभी मौका नहीं मिलता। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार की कथनी और करनी में अंतर है, जिसके कारण सनातन धर्म के अनुयायी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। शंकराचार्य ने गाय को ‘राष्ट्र माता’ घोषित करने के मुद्दे को भी उठाया और कहा कि जब तक समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव पार्टी स्तर पर गाय को राष्ट्र माता घोषित करने की घोषणा नहीं कर देते, तब तक वे उनके साथ भी नहीं हैं। यह बयान सभी राजनीतिक दलों पर समान रूप से दबाव बनाने की कोशिश मालूम पड़ता है कि वे गौ-रक्षा के मुद्दे पर अपनी स्थिति स्पष्ट करें।

अविमुक्तेश्वरानंद की विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर चेतावनी

शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने आने वाले 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर एक बड़ी चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि अगर कोई भी राजनीतिक दल गाय को राष्ट्रमाता घोषित करने की बात नहीं करेगा, तो वे खुद अपना कोई आदमी चुनाव मैदान में उतार देंगे। यह बयान राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर सकता है, क्योंकि यह सीधे तौर पर एक धार्मिक नेता द्वारा राजनीतिक हस्तक्षेप की घोषणा है। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार पर सीधे हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि प्रदेश में 16 करोड़ पशुओं को मारकर खा लिया गया है और योगी सरकार इस पर रोक नहीं लगा सकी। शंकराचार्य ने सवाल किया कि अगर पहले के मुख्यमंत्री गायों के मांस की बिक्री पर रोक नहीं लगा पाए, तो इस बार योगी सरकार ने भी उस पर क्यों रोक नहीं लगाया। इसका सीधा मतलब है कि इनकी इच्छा ही नहीं है कि गाय को कटने से रोका जाए। यह आरोप सरकार की गौ-रक्षा नीतियों पर सीधा प्रहार है और इससे ब्राह्मण समाज में नाराजगी देखी जा रही है।

योगी आदित्यनाथ पर एक और गंभीर सवाल खड़ा करते हुए शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि एक व्यक्ति दो पद कैसे संभाल सकता है। उन्होंने कहा कि जब योगी आदित्यनाथ एक संत हैं, तो वे उत्तर प्रदेश सरकार से वेतन लेकर इस पद का गलत तरीके से निर्वहन क्यों कर रहे हैं। शंकराचार्य ने साफ तौर पर कहा कि उन्हें दोनों में से एक पद छोड़ देना चाहिए। संत होने के नाते उन्हें राज-पद से विरक्ति रखनी चाहिए, लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे हैं और खुद को योगी सन्यासी कहकर दोनों पद लेकर चल रहे हैं, जो किसी भी मर्यादा के अनुकूल नहीं है। यह बयान संत समाज की परंपरा और राजनीतिक पद के बीच के नैतिक संघर्ष को उजागर करता है, और योगी आदित्यनाथ की दोहरी भूमिका पर सवाल खड़े करता है।

शंकराचार्य ने संत की भूमिका पर विशेष प्रकाश डाला

शंकराचार्य ने अपने संबोधन में एक संत की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि कोई भी शंकराचार्य प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या राष्ट्रपति का पद भी नहीं लेना चाहता, क्योंकि उसका पद इन सभी राजनीतिक पदों से बड़ा होता है। शंकराचार्य का पद धर्म का सर्वोच्च पद माना जाता है, जो किसी भी सांसारिक पद से ऊपर है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी संत सरकारी नहीं, बल्कि असरकारी होना चाहिए। इसका अर्थ है कि एक संत को सरकार के अधीन काम करने के बजाय, समाज और धर्म पर अपने नैतिक प्रभाव से असर डालना चाहिए। इस पूरे ‘सनातन संवाद’ कार्यक्रम को ब्राह्मण समाज के भीतर एक नई राजनीतिक चेतना और एकजुटता के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जिसका सीधा असर आगामी चुनावों में देखने को मिल सकता है।