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वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में दर्शन व्यवस्था को लेकर क्यों बढ़ा विवाद? गर्भगृह से जगमोहन में ठाकुर जी को लाने पर गोस्वामी और कमेटी में ठनी

Written by:Rishabh Namdev
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वृंदावन के प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर में हाई पावर्ड कमेटी द्वारा ठाकुर जी की प्रतिमा को गर्भगृह से निकालकर जगमोहन में स्थापित करने के फैसले पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। गोस्वामी समाज का एक धड़ा इसे सदियों पुरानी परंपरा का उल्लंघन बता रहा है, जबकि कमेटी इसे श्रद्धालुओं की सुविधा और बेहतर भीड़ प्रबंधन के लिए जरूरी कदम मान रही है।
वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में दर्शन व्यवस्था को लेकर क्यों बढ़ा विवाद? गर्भगृह से जगमोहन में ठाकुर जी को लाने पर गोस्वामी और कमेटी में ठनी

मथुरा के वृंदावन में स्थित विश्व प्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर एक बार फिर परंपरा और व्यवस्था के बीच छिड़ी बहस का केंद्र बन गया है। मंदिर की हाई पावर्ड कमेटी ने श्रद्धालुओं की बढ़ती भीड़ को देखते हुए बेहतर दर्शन व्यवस्था के लिए ठाकुर बांके बिहारी जी की प्रतिमा को गर्भगृह से जगमोहन (चबूतरे) पर विराजमान कराने का आदेश दिया, जिसके बाद से ही मंदिर परिसर में बवाल मचा हुआ है।

गोस्वामियों के एक गुट ने इस फैसले को ‘सदियों पुरानी परंपरा को तोड़ना’ करार देते हुए इसका पुरजोर विरोध किया है। उनका आरोप है कि इस कदम से पूजा पद्धति की पवित्रता भंग हुई है। वहीं, कमेटी और कुछ अन्य श्रद्धालु इस बदलाव को समय की मांग और भक्तों की सुगमता के लिए एक आवश्यक सुधार बता रहे हैं।

क्या है पूरा विवाद और क्यों हुआ बवाल?

विवाद की जड़ हाई पावर्ड कमेटी का वह आदेश है, जिसमें कहा गया कि भीड़ नियंत्रण और सुगम दर्शन के लिए ठाकुर जी को गर्भगृह से बाहर चबूतरे पर लाया जाए और भक्तों के लिए लाइन में दर्शन की व्यवस्था लागू की जाए। यह फैसला लागू होते ही विरोध के स्वर तेज हो गए। विरोध कर रहे पक्ष का कहना है कि विशेष अवसरों को छोड़कर ठाकुर जी हमेशा गर्भगृह में ही विराजते हैं। उनका यह भी आरोप है कि जिस आसन पर ठाकुर जी को जगमोहन में विराजमान किया गया, वह लकड़ी का और जर्जर था, जबकि गर्भगृह में वे चांदी के सिंहासन पर विराजते हैं। कुछ लोगों ने यहां तक आरोप लगाया कि कुछ समय के लिए गर्भगृह पर जंजीर लगा दी गई थी।

परंपरा और सुविधा पर बंटे लोग

इस फैसले ने मंदिर से जुड़े लोगों और श्रद्धालुओं को दो खेमों में बांट दिया है। एक पक्ष का मानना है कि परंपराओं से किसी भी कीमत पर छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए। उनका तर्क है कि अगर भीड़ प्रबंधन ही मकसद था तो पहले वीआईपी दर्शन को बंद किया जाना चाहिए था।

वहीं, दूसरे पक्ष की राय इससे बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि परंपराएं समय के साथ बदलती हैं और श्रद्धालुओं की सुरक्षा व सुविधा सर्वोपरि होनी चाहिए। देश के विभिन्न हिस्सों से आए कई भक्तों ने नई व्यवस्था की सराहना करते हुए कहा कि इस बार उन्हें ठाकुर जी के दर्शन पहले से कहीं ज्यादा स्पष्ट और आसानी से हुए।

“विरोध करने वाले कुछ गोस्वामी स्वयं अतीत में कोर्ट से आदेश लेकर कई परंपराएं बदल चुके हैं। वर्तमान विवाद को अनावश्यक रूप से हवा दी जा रही है। लकड़ी के जर्जर आसन पर विराजमान कराना जल्दबाजी में हुई गलती थी, भविष्य में ऐसा नहीं होगा।” — दिनेश गोस्वामी, सदस्य, हाई पावर्ड कमेटी

कमेटी के सदस्य दिनेश गोस्वामी ने आरोपों पर सफाई देते हुए कहा कि गर्भगृह के दरवाजे पर जंजीर ठाकुर जी को बंद करने के लिए नहीं, बल्कि कटहरे को पीछे खिसकने से रोकने के लिए लगाई गई थी। उन्होंने स्वीकार किया कि लकड़ी के आसन का उपयोग एक चूक थी और भविष्य में इसका ध्यान रखा जाएगा। उन्होंने कहा कि रंगभरी एकादशी से पहले यह व्यवस्था इसलिए लागू की गई क्योंकि गर्भगृह में रेलिंग लगाने के काम के कारण दर्शन बाधित हो रहे थे। फिलहाल, दोनों पक्षों के बीच गतिरोध बना हुआ है और अब देखना होगा कि यह मामला बातचीत से सुलझता है या और तूल पकड़ता है।

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Rishabh Namdev
लेखक के बारे में
मैं ऋषभ नामदेव खेल से लेकर राजनीति तक हर तरह की खबर लिखने में सक्षम हूं। मैं जर्नलिज्म की फील्ड में पिछले 4 साल से काम कर रहा हूं। View all posts by Rishabh Namdev
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