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बाइक और स्कूटर को कार जैसी सेफ्टी रेटिंग क्यों नहीं मिलती? जानलो वज़ह!

Written by:Ronak Namdev
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कारों को Bharat NCAP या Global NCAP से सेफ्टी रेटिंग मिलती है, लेकिन बाइक और स्कूटर इससे क्यों वंचित हैं? डिजाइन में फर्क, टेस्टिंग की मुश्किलें और मार्केट की सच्चाई इसके पीछे हैं। बाइक खरीदने से पहले ये जानकारी आपके लिए जरूरी है।
बाइक और स्कूटर को कार जैसी सेफ्टी रेटिंग क्यों नहीं मिलती? जानलो वज़ह!

भारत में हर साल लाखों बाइक और स्कूटर बिकते हैं, लेकिन इनके लिए कारों जैसी सेफ्टी रेटिंग नहीं है। कारों को क्रैश टेस्ट में 1-5 स्टार मिलते हैं, पर टू-व्हीलर का खुला डिजाइन और टेस्टिंग की हाई कॉस्ट इसे मुश्किल बनाती है। 2022 में 1.53 लाख सड़क हादसों में 43% टू-व्हीलर राइडर्स थे। आइए, इसकी वजह और सेफ्टी का सच समझें।

टू-व्हीलर भारत की सड़कों पर सबसे ज्यादा दिखते हैं, लेकिन इनके लिए फोर-व्हीलर जैसी सेफ्टी रेटिंग नहीं है। कारों को Bharat NCAP में फ्रंटल और साइड क्रैश टेस्ट, सेफ्टी फीचर्स और स्ट्रक्चर की मजबूती के आधार पर स्टार रेटिंग दी जाती है। टू-व्हीलर का डिजाइन हल्का और खुला होता है, जिसमें राइडर पूरी तरह एक्सपोज्ड रहता है। कार में सीटबेल्ट और एयरबैग्स प्रोटेक्शन देते हैं, लेकिन बाइक में सिर्फ हेलमेट और गियर्स पर निर्भरता है। टू-व्हीलर की टेस्टिंग के लिए कोई ग्लोबल स्टैंडर्ड नहीं है, और भारत में ये सिस्टम शुरू करना महंगा है। 2023 में भारत में 1.47 करोड़ टू-व्हीलर बिके, जिनकी कीमत 50,000 से 2 लाख रुपये थी। टेस्टिंग की कॉस्ट बढ़ने से कीमत 5,000-10,000 रुपये तक बढ़ सकती है, जो बजट सेगमेंट को हिट करेगा।

टू-व्हीलर टेस्टिंग में क्या हैं मुश्किलें?

टू-व्हीलर की सेफ्टी टेस्टिंग कारों से बिल्कुल अलग है। कारों में क्रैश टेस्ट डमी पैसेंजर्स की सेफ्टी चेक करते हैं, लेकिन बाइक में राइडर का शरीर सीधे इम्पैक्ट लेता है। क्रैश टेस्ट में बाइक का फ्रेम, ब्रेकिंग, टायर ग्रिप, और इलेक्ट्रिक बाइक्स में बैटरी सेफ्टी चेक करनी पड़ेगी। मिसाल के तौर पर, फ्रंटल क्रैश में राइडर के इंजरी लेवल को मापना जटिल है, क्योंकि हेलमेट और राइडिंग स्टाइल पर बहुत कुछ डिपेंड करता है। यूरोप में Euro NCAP ने टू-व्हीलर टेस्टिंग पर काम शुरू किया, लेकिन भारत में अभी ये शुरुआती स्टेज में है। टेस्टिंग सेंटर्स की कमी और हाई कॉस्ट भी बड़ी रुकावट हैं। अगर एक टेस्ट की कॉस्ट 2-3 लाख रुपये है, तो छोटी कंपनियों जैसे हीरो और TVS के लिए हर मॉडल को टेस्ट करना मुश्किल होगा। फिर भी, ABS और CBS जैसे फीचर्स 2019 से जरूरी किए गए हैं, जो सेफ्टी को कुछ हद तक बढ़ाते हैं।

क्या होगा टू-व्हीलर सेफ्टी का फ्यूचर

टू-व्हीलर सेफ्टी रेटिंग की जरूरत बढ़ रही है, क्योंकि भारत में सड़क हादसे बढ़ रहे हैं। 2022 में 1.53 लाख सड़क हादसों में 43% मौतें टू-व्हीलर राइडर्स की थीं, जिनमें ज्यादातर बिना हेलमेट थे। ग्लोबल रोड सेफ्टी स्टडीज कहती हैं कि सेफ्टी रेटिंग से हादसों में 20% कमी आ सकती है। भारत में ForeSee Advisors और IIT दिल्ली जैसे ग्रुप्स टू-व्हीलर के लिए क्रैश टेस्ट प्रोटोकॉल बनाने की कोशिश में हैं, जिसमें ब्रेकिंग, स्टेबिलिटी और बैटरी सेफ्टी शामिल होगी। इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर की बढ़ती डिमांड (2023 में 8.5 लाख यूनिट्स बिके) ने बैटरी सेफ्टी टेस्टिंग की رونाल्ट राइडर की जरूरत को और जरूरी बना दिया है। लेकिन जब तक रेटिंग सिस्टम नहीं आता, राइडर्स को खुद सावधानी बरतनी होगी। BIS-सर्टिफाइड हेलमेट, राइडिंग गियर्स, और ट्रैफिक नियमों का पालन सेफ्टी बढ़ा सकता है। सरकार को चाहिए कि वो सस्ते हेलमेट और सेफ्टी गियर्स पर टैक्स कम करे।

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Ronak Namdev
लेखक के बारे में
मैं रौनक नामदेव, एक लेखक जो अपनी कलम से विचारों को साकार करता है। मुझे लगता है कि शब्दों में वो जादू है जो समाज को बदल सकता है, और यही मेरा मकसद है - सही बात को सही ढंग से लोगों तक पहुँचाना। मैंने अपनी शिक्षा DCA, BCA और MCA मे पुर्ण की है, तो तकनीक मेरा आधार है और लेखन मेरा जुनून हैं । मेरे लिए हर कहानी, हर विचार एक मौका है दुनिया को कुछ नया देने का । View all posts by Ronak Namdev
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