भोपाल में रिहायशी इलाकों में चल रही दुकानों और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों पर नगर निगम की कार्रवाई फिलहाल रोक दी गई है। दरअसल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद व्यापारियों को राहत मिली है और कई इलाकों में दुकानें सोमवार से खुलने की संभावना है। हालांकि यह राहत अस्थायी मानी जा रही है, क्योंकि मामला अभी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और अगली सुनवाई से जुड़ा हुआ है।
वहीं व्यापारियों का कहना है कि अचानक हुई कार्रवाई से हजारों लोगों की रोजी-रोटी पर असर पड़ा था। वहीं सरकार का कहना है कि अंतिम फैसला कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा। इसी वजह से प्रशासन ने पूरे मामले की समीक्षा के लिए वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति बनाने का फैसला किया है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश, नगर निगम की कार्रवाई और मौजूदा नियमों का अध्ययन कर अपनी रिपोर्ट देगी। इसके बाद आगे की रणनीति तय की जाएगी।
रिहायशी इलाकों में कमर्शियल गतिविधियों पर क्या है पूरा विवाद?
दरअसल भोपाल के अरेरा कॉलोनी, रोहित नगर, शाहपुरा, बावड़ियाकलां, गुलमोहर और आसपास के कई इलाकों में लंबे समय से मकानों में दुकानें, हॉस्टल, क्लीनिक, कैफे, ऑफिस और अन्य व्यावसायिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं। इन इलाकों के कई रहवासियों का आरोप है कि इससे ट्रैफिक, पार्किंग, शोर-शराबा और सुरक्षा संबंधी समस्याएं लगातार बढ़ रही हैं। उनका कहना है कि कई स्थानों पर देर रात तक गतिविधियां चलने से सामान्य जीवन प्रभावित हो रहा है।
वहीं नगर निगम ने हाल ही में कुछ प्रतिष्ठानों को सील किया था और कई दुकानों को बंद कराने की कार्रवाई भी शुरू की थी। इसके बाद व्यापारियों और स्थानीय लोगों के बीच अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। व्यापारियों ने कहा कि उन्होंने वर्षों से वैध अनुमति और टैक्स के साथ कारोबार किया है, इसलिए अचानक कार्रवाई उचित नहीं है। दूसरी ओर रहवासी संगठनों ने आरोप लगाया कि कई जगह केवल औपचारिक कार्रवाई हुई और कुछ प्रतिष्ठान थोड़े समय बाद फिर से खुल गए। अब दोनों पक्ष अपनी-अपनी दलीलों के साथ प्रशासन और अदालत के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।
सरकार की समिति पर टिकी आगे की राह
दरअसल मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा है कि यह केवल भोपाल का मुद्दा नहीं है, बल्कि देश की कई राजधानियों में रिहायशी क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर समान स्थिति बनी हुई है। इसी कारण सरकार जल्दबाजी में कोई अंतिम निर्णय लेने के बजाय कानूनी राय और विशेषज्ञों की रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ना चाहती है। गठित की जाने वाली समिति यह भी देखेगी कि किन मामलों में नियमों के तहत राहत दी जा सकती है और किन मामलों में कार्रवाई जरूरी होगी।






