आज नाग पंचमी का पर्व देशभर में श्रद्धाभक्ति के साथ मनाया जा रहा है। इस अवसर पर मंदिरों में भगवान शिव और नाग देवता की विशेष पूजा-अर्चना की जा रही है। इस बार नाग पंचमी सावन सोमवार के दिन पड़ रही है जिससे पर्व का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है।
नाग पंचमी के अवसर पर मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने प्रदेशवासियों और सभी श्रद्धालुओं को शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा कि “नाग पंचमी के पर्व पर नाग देवता का आशीर्वाद सभी नागरिकों के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि एवं आरोग्य लेकर आए।”मुख्यमंत्री ने कहा कि यह पर्व प्रकृति, जीव-जंतुओं और पर्यावरण के प्रति आस्था, संवेदनशीलता एवं संरक्षण के संकल्प को और सुदृढ़ करे, यही कामना है।
भगवान शिव और नाग देवता की पूजा का महत्व
नाग पंचमी के दिन श्रद्धालु नाग देवता की पूजा के साथ भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि इस दिन नाग देवता की आराधना करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और नाग देवता की कृपा प्राप्त होती है।हिंदू धार्मिक मान्यताओं में नागों का विशेष स्थान है। भगवान शिव के गले में नाग के विराजमान होने के कारण नाग पूजा का संबंध शिव आराधना से भी माना जाता है। वहीं भगवान विष्णु का शेषनाग पर शयन करना भी नागों के धार्मिक महत्व को दर्शाता है।
इस तरह करें नागपंचमी की पूजा
नाग पंचमी पर सुबह स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल की सफाई की जाती है। इसके बाद नाग देवता की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर पूजा करें। नाग देवता को जल, दूध, हल्दी, कुमकुम, अक्षत, फूल और धूप-दीप अर्पित करें। इसके बाद नाग पंचमी की कथा सुनी जाती है और नाग देवता से परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करें। कई श्रद्धालु इस दिन भगवान शिव का जलाभिषेक कर बेलपत्र और पुष्प अर्पित करते हैं। ‘ॐ नमः शिवाय’ और नाग देवता से जुड़े मंत्रों का जाप भी किया जाता है।
नाग पंचमी से जुड़ी अनोखी परंपरा
नाग पंचमी की सबसे खास परंपराओं में इस दिन जमीन खोदने से परहेज करना शामिल है। धार्मिक मान्यता के अनुसार नाग देवता और अन्य जीव धरती के भीतर रहते हैं, इसलिए इस दिन भूमि की खुदाई नहीं की जाती। बारिश के मौसम में सांपों और दूसरे जीवों के बिलों को नुकसान न पहुंचे, इसे इस परंपरा के प्रकृति संरक्षण से जुड़े पक्ष के रूप में भी देखा जाता है। कई ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी नाग पंचमी के दिन हल चलाने, जमीन खोदने या कृषि से जुड़े कुछ कार्यों से परहेज किया जाता है।
अलग-अलग राज्यों में अलग परंपराएं
नाग पंचमी देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरीके से मनाई जाती है। कई स्थानों पर घरों के मुख्य द्वार या दीवारों पर नाग का चित्र बनाकर पूजा की जाती है। कहीं नाग देवता की प्रतिमाओं की पूजा होती है तो कहीं नाग मंदिरों में विशेष धार्मिक आयोजन किए जाते हैं। दक्षिण भारत के कुछ क्षेत्रों में नाग प्रतिमाओं को पेड़ों के नीचे स्थापित करने और नागों से जुड़े पवित्र उपवनों को संरक्षित रखने की परंपरा भी देखने को मिलती है। वहीं पूर्वी भारत के कई हिस्सों में नाग पूजा का संबंध मनसा देवी की आराधना से भी जुड़ा है।
कृषि जीवन से भी जुड़ा है नाग पंचमी का पर्व
नाग पंचमी का संबंध सिर्फ धार्मिक आस्था से नहीं बल्कि कृषि और ग्रामीण जीवन से भी रहा है। सांप खेतों में चूहों और दूसरे कृंतकों की संख्या नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस कारण कृषि प्रधान समाज में नागों को खेतों के लिए उपयोगी जीव के रूप में भी देखा जाता रहा है। यही वजह है कि नाग पंचमी को प्रकृति के साथ मनुष्य के सह-अस्तित्व की परंपरा से जोड़कर देखा जाता है।
महाभारत से जुड़ी है आस्तीक मुनि की कथा
नाग पंचमी से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाओं में आस्तीक मुनि और जनमेजय के सर्प यज्ञ की कथा प्रसिद्ध है। मान्यता है कि राजा परीक्षित की सर्पदंश से मृत्यु के बाद उनके पुत्र जनमेजय ने नागों के विनाश के लिए सर्प यज्ञ कराया था। इसी दौरान आस्तीक मुनि ने हस्तक्षेप कर यज्ञ रुकवाया और नागों की रक्षा की। इस कथा को नागों के संरक्षण और जीवों के प्रति करुणा की भावना से जोड़कर भी देखा जाता है।
कालिया नाग की कथा भी है प्रसिद्ध
नाग पंचमी के संदर्भ में भगवान कृष्ण और कालिया नाग की कथा भी प्रमुख रूप से सुनाई जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कालिया नाग के विष से यमुना का जल दूषित हो गया था। भगवान कृष्ण ने कालिया नाग का दमन कर यमुना को उसके विष से मुक्त कराया और उसे वहां से चले जाने का निर्देश दिया।यह प्रसंग बुराई पर अच्छाई की विजय और प्रकृति को प्रदूषण से मुक्त करने के संदेश से भी जोड़ा जाता है।






