भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपरा, दर्शन, साहित्य और वैज्ञानिक चिंतन को हजारों वर्षों से अभिव्यक्ति देने वाली संस्कृत भाषा के सम्मान में आज विश्व संस्कृत दिवस मनाया जा रहा है। हर वर्ष हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा पर “विश्व संस्कृत दिवस”मनाया जाता है। इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व भी होता है।
आज के दिन सीएम मोहन यादव ने शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने आह्वान किया कि “संस्कृत भारत की ज्ञान, संस्कृति और गौरवशाली परंपरा की आधारशिला है। वेद, उपनिषद, दर्शन और साहित्य की समृद्ध विरासत को संजोए यह शाश्वत भाषा हमारी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ती है। आइए, विश्व संस्कृत दिवस पर संस्कृत के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार का संकल्प लें।”
वेदों से शुरु होती है संस्कृत की यात्रा
संस्कृत को अक्सर धार्मिक अनुष्ठानों और प्राचीन ग्रंथों की भाषा के रूप में देखा जाता है, लेकिन इसका इतिहास इससे कहीं व्यापक है। यह भाषा भारतीय उपमहाद्वीप की दार्शनिक, साहित्यिक, वैज्ञानिक और बौद्धिक परंपराओं की प्रमुख वाहक रही है। आज भी भारत के साथ-साथ दुनिया के कई देशों में विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों के माध्यम से संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन जारी है।
संस्कृत के आरंभिक रूप को वैदिक संस्कृत कहा जाता है। ऋग्वेद सहित वैदिक साहित्य इसी भाषा की प्राचीन परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। वैदिक मंत्रों और ग्रंथों का संरक्षण लंबे समय तक लिखित रूप से नहीं, बल्कि अत्यंत विकसित मौखिक परंपरा के माध्यम से हुआ। यूनेस्को ने वैदिक मंत्रोच्चारण की परंपरा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया है।
बाद के दौर में संस्कृत का अधिक व्यवस्थित और परिष्कृत रूप सामने आया। चौथी शताब्दी ईसा पूर्व के आसपास पाणिनि ने अष्टाध्यायी के माध्यम से संस्कृत के व्याकरण को अत्यंत व्यवस्थित रूप प्रदान किया। पाणिनि की व्याकरण परंपरा को भाषाविज्ञान के इतिहास की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जाता है।
साहित्य और दर्शन से विज्ञान तक
संस्कृत का योगदान सिर्फ धार्मिक साहित्य तक सीमित नहीं रहा। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, पुराण, दर्शनशास्त्र और काव्य की विशाल परंपरा संस्कृत में विकसित हुई। कालिदास, भास, भवभूति और बाणभट्ट जैसे साहित्यकारों ने संस्कृत साहित्य को समृद्ध किया। इसी भाषा में गणित, खगोल विज्ञान, आयुर्वेद, चिकित्सा, व्याकरण, तर्कशास्त्र और दर्शन से संबंधित महत्वपूर्ण ग्रंथ भी रचे गए।
आईआईटी और अन्य संस्थानों के संस्कृत संबंधी अध्ययन के अनुसार संस्कृत साहित्य में गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और भाषाविज्ञान जैसे क्षेत्रों की महत्वपूर्ण सामग्री मिलती है। संस्कृत का प्रभाव बौद्ध और जैन परंपराओं पर भी रहा। बौद्ध साहित्य का बड़ा हिस्सा पालि में और जैन साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा प्राकृत में विकसित हुआ, लेकिन दोनों परंपराओं में संस्कृत साहित्य की भी समृद्ध धारा मौजूद रही।
संस्कृत ने भारतीय भाषाओं के विकास और शब्द-संपदा को गहराई से प्रभावित किया है। भारत की अनेक आधुनिक भाषाओं में संस्कृत से आए शब्द बड़ी संख्या में मिलते हैं। संस्कृत और उससे विकसित या प्रभावित भाषाई परंपराओं के बीच संबंध भारतीय भाषायी इतिहास की महत्वपूर्ण कड़ी है। इसी कारण संस्कृत को समझना सिर्फ एक प्राचीन भाषा को समझना नहीं, बल्कि भारतीय भाषाओं और साहित्य के विकास की एक महत्वपूर्ण धारा को समझना भी है। भारत सरकार का संस्कृत विभाग भी संस्कृत को भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के विकास में महत्वपूर्ण मानता है।






