बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़े फेरबदल की अटकलें तेज हो गई हैं। चर्चा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सीएम की कुर्सी छोड़कर केंद्र की राजनीति में यानी राज्यसभा जा सकते हैं। बुधवार शाम को मुख्यमंत्री आवास पर इस सिलसिले में एक अहम बैठक भी हुई, जिसमें विजय चौधरी और संजय झा जैसे वरिष्ठ नेता मौजूद थे। हालांकि, पार्टी के कई बड़े नेता कथित तौर पर नहीं चाहते कि नीतीश दिल्ली जाएं।
इन अटकलों के बीच सबसे चौंकाने वाला नाम नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार का सामने आया है। कहा जा रहा है कि उन्हें राज्यसभा भेजकर राजनीति में उनकी एंट्री कराई जा सकती है। पार्टी ने अभी तक इन चर्चाओं का खंडन नहीं किया है, जिससे कयासों का बाजार और गर्म हो गया है। उम्मीद है कि जेडीयू आज अपने दोनों राज्यसभा उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर देगी।
सूत्रों के मुताबिक, एक सीट पर केंद्रीय मंत्री रामनाथ ठाकुर का नाम लगभग तय माना जा रहा है और उन्होंने नामांकन से जुड़ी प्रक्रियाएं भी पूरी कर ली हैं। असली पेंच दूसरी सीट को लेकर फंसा है, जिस पर नीतीश कुमार अपने और बेटे निशांत के नाम पर विचार कर रहे हैं।
सियासत के तीन संभावित समीकरण
मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए तीन मुख्य संभावनाएं उभर रही हैं।
पहली स्थिति: नीतीश कुमार खुद राज्यसभा चले जाएं। ऐसे में उनके बेटे निशांत को बिहार में उपमुख्यमंत्री बनाया जा सकता है और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भाजपा अपना दावा पेश कर सकती है।
दूसरी स्थिति: नीतीश कुमार बिहार में ही रहें और अपने बेटे निशांत को राज्यसभा भेजकर उनकी औपचारिक राजनीतिक शुरुआत कराएं।
तीसरी स्थिति: यह भी संभव है कि रामनाथ ठाकुर के अलावा दूसरे उम्मीदवार पर आम सहमति नहीं बन पा रही है, इसलिए इन बड़े नामों को लेकर सिर्फ चर्चा हो रही है।
“ऐसी कोई चर्चा नहीं है। ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न नहीं होने वाली है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अनुभवी नेतृत्व में हमारी सरकार बिहार में चल रही है। हम लोग बिहार में मुख्यमंत्री बदलने नहीं जा रहे हैं।” — चिराग पासवान, लोजपा (रामविलास) अध्यक्ष
निशांत की एंट्री के क्या हैं मायने?
अगर निशांत कुमार की राजनीति में एंट्री होती है, तो इसके दो बड़े और दूरगामी संकेत होंगे। पहला, यह नीतीश कुमार के सक्रिय राजनीति से रिटायर होने का संकेत हो सकता है। 76 साल के हो चुके नीतीश कुमार स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों का भी सामना कर रहे हैं। वे हमेशा परिवारवाद के खिलाफ मुखर रहे हैं, ऐसे में अगर वह बेटे को आगे लाते हैं तो इसका मतलब यह निकाला जाएगा कि वह अपनी राजनीतिक विरासत सौंपकर खुद पीछे हटने की तैयारी में हैं।
दूसरा, निशांत के आने से JDU का भविष्य तय हो जाएगा। पार्टी में नीतीश के बाद नेतृत्व का एक बड़ा संकट है। ललन सिंह, संजय झा या विजय चौधरी जैसे नेता नीतीश के कोर वोट बैंक (कुर्मी-कोईरी और EBC) के समीकरण में पूरी तरह फिट नहीं बैठते। आरसीपी सिंह और उपेंद्र कुशवाहा जैसे नेता पहले ही पार्टी से बाहर हो चुके हैं। ऐसे में निशांत का आना पार्टी के अस्तित्व को नीतीश के बाद भी बनाए रखने की एक कोशिश हो सकती है।
JDU में क्यों पैदा हुई यह स्थिति?
नीतीश कुमार ने पिछले दो दशकों में पार्टी के अंदर दूसरी पंक्ति का कोई मजबूत नेतृत्व उभरने नहीं दिया। आरसीपी सिंह, जिन्हें कभी नीतीश का ‘आंख-कान-नाक’ कहा जाता था, राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी से बाहर हो गए। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी कुछ समय के लिए उनके उत्तराधिकारी के तौर पर देखे गए, लेकिन वह भी अलग हो गए। उपेंद्र कुशवाहा और मनीष वर्मा जैसे नेताओं को भी आगे बढ़ने का मौका नहीं मिला। इस नेतृत्व संकट ने ही निशांत के नाम को JDU की मजबूरी बना दिया है, ताकि पार्टी का वोट बैंक न बिखरे। भाजपा भी नहीं चाहेगी कि JDU के बिखरने का फायदा बिहार में प्रशांत किशोर जैसे किसी तीसरे खिलाड़ी को मिले।






