बिहार में राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों के बीच राज्यपाल पद पर बदलाव की घोषणा की गई है। लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन को बिहार का नया राज्यपाल नियुक्त किया गया है।
राजभवन में यह परिवर्तन इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि वे आरिफ मोहम्मद खान का स्थान लेंगे, जो 2 जनवरी 2025 को बिहार के राज्यपाल बने थे। केंद्र की ओर से हुए इस फैसले के बाद राज्य की सियासत और प्रशासनिक हलकों में इसकी चर्चा तेज है।
सैयद अता हसनैन भारतीय सेना में लंबे और वरिष्ठ अनुभव के साथ आते हैं। उन्होंने 1974 से 2013 तक सेना में सेवा दी। वे श्रीनगर स्थित चिनार कोर के पूर्व कमांडिंग इन चीफ रह चुके हैं। सैन्य मामलों पर उनकी समझ को लेकर उन्हें स्कॉलर के रूप में भी देखा जाता रहा है। वे मिलिट्री सेक्रेटरी के पद से सेवानिवृत्त हुए थे और बाद में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सदस्य भी रहे।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं: BJP नेताओं ने दी बधाई
नियुक्ति के बाद बिहार BJP के प्रमुख नेताओं ने सार्वजनिक रूप से प्रतिक्रिया दी। बिहार बीजेपी के चीफ संजय सरावगी ने X पर पोस्ट करते हुए कहा कि राज्य को उनके नेतृत्व से नई दिशा मिल सकती है।
“बिहार के राज्यपाल के रूप में सुशोभित होने पर लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) श्री सैयद अता हसनैन जी को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं। आपकी राष्ट्रसेवा की भावना एवं दूरदर्शी नेतृत्व से बिहार को नई दिशा और ऊर्जा मिलेगी। ईश्वर से आपके सफल एवं उज्ज्वल कार्यकाल की कामना करता हूं।” — संजय सरावगी
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने भी नियुक्ति का स्वागत किया और इसे सुशासन तथा संवैधानिक संस्थाओं की मजबूती से जोड़ा।
“लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) श्री सैयद अता हसनैन जी को बिहार के राज्यपाल के रूप में नियुक्त होने पर हार्दिक बधाई एवं स्वागत। देश सेवा में आपका गौरवपूर्ण सैन्य अनुभव, नेतृत्व क्षमता और अनुशासन निश्चित ही बिहार के विकास, सुशासन और संवैधानिक मूल्यों को और सशक्त करेगा। बिहार की जनता की ओर से आपको हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।” — विजय कुमार सिन्हा
सेना से राजभवन तक: सैयद अता हसनैन का प्रोफाइल
हसनैन का करियर मुख्य रूप से ऑपरेशनल और रणनीतिक जिम्मेदारियों से जुड़ा रहा। चिनार कोर में उनकी भूमिका के कारण उनका नाम राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श में लगातार चर्चा में रहा। रिटायरमेंट के बाद संस्थागत नीति-निर्माण, आपदा प्रबंधन और रणनीतिक विषयों पर उनकी भागीदारी ने उनकी सार्वजनिक भूमिका को और व्यापक बनाया। यही वजह है कि बिहार जैसे बड़े राज्य में उनकी नियुक्ति को केवल औपचारिक बदलाव की तरह नहीं देखा जा रहा।
बिहार में राज्यपाल की भूमिका संवैधानिक रूप से महत्वपूर्ण है, खासकर तब जब सरकार गठन, विधानसभा की प्रक्रियाएं, और राजनीतिक समीकरण सक्रिय हों। ऐसे दौर में अनुभव-संपन्न व्यक्ति की नियुक्ति को प्रशासनिक स्थिरता के संदर्भ में भी पढ़ा जा रहा है।
आजादी के बाद बिहार के राज्यपाल: लंबी संवैधानिक परंपरा
आजादी के बाद बिहार में कई वरिष्ठ सार्वजनिक हस्तियां राज्यपाल रहीं। शुरुआती दौर में जयरामदास दौलतराम (15 अगस्त 1947 से 11 जनवरी 1948), माधव श्रीहरि अणे (12 जनवरी 1948 से 14 जून 1952), आर. आर. दिवाकर (15 जून 1952 से 5 जुलाई 1957) और डॉ. जाकिर हुसैन (6 जुलाई 1957 से 11 मई 1962) इस पद पर रहे।
इसके बाद मदभूषि अनन्तशयनम् अय्यंगार, नित्यानंद कानूनगो, उज्जवल नारायण सिंह, देवकांत बरूआ और रामचंद्र धोडिंबा भंडारे ने राज्यपाल पद संभाला। 1970 और 1980 के दशक में जगन्नाथ कौशल, कृष्ण बल्लभ नारायण सिंह, डॉ. अखलाक-उर-रहमान किदवई, पेंडेकंती वेंकटसुब्बैया और गोविंद नारायण सिंह जैसे नाम इस सूची में शामिल रहे।
आगे चलकर दीपक कुमार सेन, रामचंद्र दत्तात्रेय प्रधान, जगन्नाथ पहाड़िया, गंगाधर गणेश सोहनी, मोहम्मद यूनुस सलीम, मुहम्मद शफी कुरेशी और एक बार फिर अखलाक-उर-रहमान किदवई ने भी कार्यभार संभाला। 1998 के बाद सुंदर सिंह भंडारी, ब्रजमोहन लाल, सूरज भान, विनोद चंद्र पांडे और मंडगद्ददे रामा जोयिस का कार्यकाल रहा।
2004 के बाद वेद प्रकाश मारवाह, बूटा सिंह, गोपालकृष्ण गांधी, आर. एस. गवई, आर. एल. भाटिया, देबानन्द कुँवर, ज्ञानदेव यशवंतराव पाटील, केशरी नाथ त्रिपाठी, राम नाथ कोविंद, सत्य पाल मलिक, लाल जी टंडन, फागू चौहान और राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर इस पद पर रहे। राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर का कार्यकाल 17 फरवरी 2023 से 1 जनवरी 2025 तक दर्ज है।
अब इस संवैधानिक क्रम में सैयद अता हसनैन का नाम जुड़ गया है। आने वाले समय में उनकी भूमिका पर नजर रहेगी, खासकर उस चरण में जब राज्य में राजनीतिक पुनर्संरचना और प्रशासनिक निर्णय साथ-साथ चल रहे हैं।






