
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में अब कांग्रेस की भूमिका बेहद अहम हो गई है। कुछ समय पहले तक माना जा रहा था कि कांग्रेस कमजोर स्थिति में रहेगी और राजद उसकी सीटें कम कर सकती है। लेकिन अब राहुल गांधी के आक्रामक रुख ने तस्वीर बदल दी है। वे लगातार बिहार में डटे हुए हैं और चुनावी रणनीति को खुद लीड कर रहे हैं। इससे महागठबंधन के भीतर नए समीकरण बनते दिख रहे हैं।
सीट शेयरिंग पर सीधा असर
राहुल गांधी की सक्रियता का सबसे बड़ा असर सीट बंटवारे पर होगा। पहले अनुमान था कि कांग्रेस को 35 से 45 सीटें ही मिलेंगी, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। कांग्रेस अब मांगने के बजाय हक जताने की मुद्रा में होगी। संभावना है कि कांग्रेस को 50 से 55 सीटें मिल सकती हैं। साथ ही, इस बार पार्टी जीतने योग्य सीटों पर भी दावा करेगी, न कि सिर्फ कमजोर इलाकों पर।
सहयोगी दलों की मुश्किलें बढ़ेंगी
कांग्रेस के मजबूत होने से राजद को उसकी सीटें कम करने की रणनीति पर रोक लगानी पड़ सकती है। पहले योजना थी कि भाकपा माले और अन्य वाम दलों को ज्यादा सीटें दी जाएं, लेकिन अब कांग्रेस इतनी आसानी से कटौती स्वीकार नहीं करेगी। इसका सीधा असर वाम दलों और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) पर पड़ेगा। खासतौर पर मुकेश सहनी की 60 सीटों और डिप्टी सीएम पद की मांग पर भी विराम लग सकता है।
लालू प्रसाद का कम होता दखल
अब तक माना जाता था कि बिहार कांग्रेस पर लालू प्रसाद यादव का सीधा प्रभाव रहता था। प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी के चयन में भी उनकी राय हावी रहती थी। लेकिन राहुल गांधी की बढ़ती सक्रियता से यह प्रभाव कम हो सकता है। पार्टी अब स्वतंत्र रूप से अपनी रणनीति तय करने की कोशिश करेगी, जिससे कांग्रेस में नया जोश दिखाई दे सकता है।
तेजस्वी के लिए चुनौतीपूर्ण स्थिति
राहुल गांधी की बढ़ती मौजूदगी से तेजस्वी यादव का फोकस कम होता दिख रहा है। 12 दिन तक राहुल बिहार में रहेंगे, जिससे मीडिया कवरेज भी उन्हीं के इर्द-गिर्द रहेगा। ऐसे में तेजस्वी को साइड रोल में रहना पड़ सकता है। अगर कांग्रेस अपनी स्थिति मजबूत कर लेती है, तो यह राजद के लिए सीट शेयरिंग और नेतृत्व के सवाल पर बड़ी चुनौती बन सकती है।
