
बिहार की राजनीति में इस वक्त हलचल तेज है. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने गुरुवार को बड़ा ऐलान कर सबको चौंका दिया. उन्होंने कहा कि इस बार वे बिहार की सभी 243 विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ेंगे. मुजफ्फरपुर के कांटी में हुई सभा में तेजस्वी ने जनता से अपील की कि “चाहे बोचहां हो या मुजफ्फरपुर, आप वोट मेरे नाम पर दें, बिहार को आगे ले जाना मेरी जिम्मेदारी है.” यह बयान केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि पूरे महागठबंधन की एकता पर सवाल खड़े कर रहा है.
महागठबंधन में बढ़ी तनातनी
तेजस्वी यादव का यह बयान तब आया है जब महागठबंधन के भीतर पहले से ही सीट बंटवारे और मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर खींचतान चल रही है. कांग्रेस और वामपंथी दल लगातार ज्यादा सीटों की मांग कर रहे हैं. लेकिन तेजस्वी के इस एलान ने इन सबको दरकिनार कर दिया और खुद को गठबंधन का चेहरा घोषित कर दिया. सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब भी तेजस्वी को नेता मानने को तैयार होगी या गठबंधन की एकता खतरे में पड़ जाएगी?
एकजुटता पर पड़ा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि तेजस्वी की यह जल्दबाजी गठबंधन की जड़ों को कमजोर कर सकती है. हाल ही में राहुल गांधी और तेजस्वी ने वोटर अधिकार यात्रा में एकजुटता का संदेश दिया था, लेकिन अब तेजस्वी के एकतरफा एलान से समर्थकों के बीच भ्रम की स्थिति बन सकती है. गठबंधन की राजनीति संतुलन और सहयोग पर चलती है, लेकिन यहां “गठबंधन धर्म” की अनदेखी दिखाई दे रही है. ऐसे में यह कदम महागठबंधन की ताकत को ही कमजोर कर सकता है.
चुनावी समीकरण पर असर
तेजस्वी यादव इस समय सी-वोटर सर्वे में बिहार का सबसे लोकप्रिय चेहरा बने हुए हैं, लेकिन उनकी लोकप्रियता फरवरी के 40.6% से घटकर अप्रैल में 35.5% तक आ गई है. विश्लेषकों का कहना है कि यदि इस तरह के विवाद बढ़ते रहे तो यह गिरावट और तेज हो सकती है. बिहार में गरीबी, बेरोजगारी और बुनियादी ढांचे की चुनौतियां पहले से ही बड़ी हैं. ऐसे में विपक्ष की प्राथमिकता एकजुट होकर एनडीए को चुनौती देना होना चाहिए था, लेकिन तेजस्वी का यह कदम सत्ता की लड़ाई में खुद गठबंधन को कमजोर कर सकता है.
