पटना: बिहार के वरिष्ठ समाजवादी नेता शिवानंद तिवारी ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से सीधा सवाल पूछा है। तिवारी ने मांग की है कि नीतीश कुमार उस सरकारी कोठी पर हुए खर्च का ब्योरा सार्वजनिक करें, जिसमें वह अब रहने जा रहे हैं। यह वही मुख्यमंत्री आवास है जिसे जीतन राम मांझी के मुख्यमंत्री बनने के बाद ‘हाईटेक’ सुविधाओं से लैस किया गया था। उस समय इस कोठी पर करोड़ों रुपये खर्च हुए थे, लेकिन उसका पूरा हिसाब आज तक जनता के सामने नहीं आया है।
पूर्व राज्यसभा सांसद शिवानंद तिवारी, जो कभी नीतीश कुमार के करीबी रहे थे, ने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट लिखकर मुख्यमंत्री की ईमानदारी पर सवाल उठाया है। उन्होंने अपनी पोस्ट में लिखा है, “नीतीश जी उसी मकान में रहने जा रहे हैं जहां पूर्व में भी वे भूतपूर्व मुख्यमंत्री के रूप में रह चुके हैं। जीतन राम मांझी जी को कुछ दिनों के लिए जब उन्होंने मुख्यमंत्री बनाया था, वही कोठी उनके लिए तैयार की गई थी।” तिवारी ने आगे बताया कि उन दिनों चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर भी नीतीश कुमार के साथ हुआ करते थे और यह मकान प्रशांत किशोर का भी कार्यालय रहा था।
मुख्यमंत्री आवास को ‘हाईटेक’ बनाने में करोड़ों रुपये खर्च
तिवारी ने अपनी पोस्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया है कि उस मुख्यमंत्री आवास को आधुनिक सुविधाओं से लैस करने और ‘हाईटेक’ बनाने में करोड़ों रुपये खर्च हुए थे। हालांकि, उन्होंने कहा कि कुल कितनी राशि उस कोठी पर खर्च की गई है, यह जानकारी आज तक सार्वजनिक नहीं की गई है। तिवारी ने स्पष्ट शब्दों में नीतीश कुमार को चुनौती देते हुए कहा है, “अगर नीतीश कुमार सचमुच ईमानदार हैं तो जीतन राम मांझी जी को मुख्यमंत्री बनाने के बाद जब वे उस कोठी में रहने गए थे तब कुल मिलाकर कितने करोड़ रुपये उस पर खर्च हुए हैं इसकी जानकारी सार्वजनिक करें।” यह सवाल सीधे तौर पर सरकारी धन के उपयोग में पारदर्शिता की कमी को उजागर करता है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद का है, जब जनता दल (यूनाइटेड) की खराब परफॉर्मेंस के बाद नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उस समय उन्होंने अपने बेहद करीबी और एक दलित नेता जीतन राम मांझी को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी थी। नीतीश कुमार उस दौरान खुद को एक बड़े भाई की भूमिका में रखते हुए सरकार से सीधे तौर पर दूरी बनाए हुए थे। इसी दौरान मुख्यमंत्री आवास को अत्याधुनिक सुविधाओं के साथ फिर से तैयार किया गया था ताकि नए मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी वहां से आसानी से काम कर सकें। कई रिपोर्टों में यह भी बताया गया था कि प्रशांत किशोर उस समय नीतीश कुमार के सलाहकार के तौर पर सक्रिय थे और उन्होंने इस आवास को अपने कार्यालय के रूप में भी इस्तेमाल किया था।
हालांकि, जीतन राम मांझी का कार्यकाल कुछ ही महीनों का रहा और मार्च 2015 में नीतीश कुमार ने मांझी को हटाकर एक बार फिर खुद मुख्यमंत्री का पद संभाला था। अब एक दशक बाद नीतीश कुमार एक बार फिर उसी सरकारी आवास में वापस जा रहे हैं, जिसे उस संक्रमण काल में ‘हाईटेक’ रूप दिया गया था। इस वापसी ने पुराने सवालों को फिर से हवा दे दी है और सरकारी खजाने से हुए खर्च पर पारदर्शिता की मांग तेज हो गई है।
कौन हैं शिवानंद तिवारी?
शिवानंद तिवारी बिहार की राजनीति में एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता के रूप में जाने जाते हैं। वे सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि अपनी मुखर राय और बेबाक लेखन के लिए भी प्रसिद्ध हैं। वे राजनीतिक, सामाजिक, सिनेमा और संस्कृति से जुड़े विभिन्न मामलों पर लगातार सोशल मीडिया पर लिखते रहते हैं। उनके लेख काफी रोचक होते हैं और अक्सर उनके व्यक्तिगत संस्मरणों से जुड़े होते हैं, जिसके कारण वे लोगों के बीच काफी पसंद किए जाते हैं। ऐसे में, उनके द्वारा उठाया गया यह सवाल नीतीश कुमार और उनकी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है। तिवारी के सवाल को एक पूर्व करीबी द्वारा उठाया गया सवाल माना जा रहा है, जो इसकी गंभीरता को और बढ़ा देता है।
शिवानंद तिवारी की पोस्ट पर नेटिजन्स की प्रतिक्रियाएं
शिवानंद तिवारी के इस पोस्ट पर नेटिजन्स ने सोशल मीडिया पर जमकर प्रतिक्रिया दी है। लोगों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई नजर आ रही है। कुछ लोग शिवानंद तिवारी के सवाल का समर्थन कर रहे हैं और पारदर्शिता की मांग को जायज ठहरा रहे हैं, तो वहीं कुछ यूजर्स ने तिवारी से ही पलटकर सवाल पूछना शुरू कर दिया है। कई लोगों ने तो आज के दौर की राजनीति में नेताओं की ईमानदारी पर ही आम सवाल खड़े कर दिए हैं, जो एक बड़ी निराशा को दर्शाता है।
एक यूजर अविनाश राय ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा है कि “ईमानदार तो इस देश में कोई नेता ही नहीं है। भले जनता के बीच में ब्रांड बन जाए। अब कोई लालबहादुर शास्त्री और राजनारायण जैसा कोई नहीं बनेगा। नेता अपने लूटे या न लूटे लेकिन अपने लोगों से देश और राज्य के बजट को जरूर लूटवाता है।” यह टिप्पणी आज के राजनीतिक परिदृश्य में नेताओं की विश्वसनीयता पर आम जनता के गहरे संदेह और अविश्वास को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
एक अन्य यूजर के.एन. दुबे ने अपनी प्रतिक्रिया भोजपुरी में तंज कसते हुए दी है। उन्होंने लिखा, “आरटीआई लगाईं, डेरात बानी का? लेकिन रऊआ लगाइब ना, ओकर भी कारण मालूम बा। सबके भेद खुल जाई।” इस टिप्पणी में यह तीखा व्यंग्य है कि पारदर्शिता की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले खुद भी कई बार पूरी सच्चाई सामने लाने से डरते हैं क्योंकि ऐसा करने से कई लोगों के गहरे राज खुल सकते हैं, जिनमें शायद सवाल उठाने वाले भी शामिल हों।
एक यूजर ने शिवानंद तिवारी से ही पलटकर सवाल किया
दीपक कुमार श्रीवास्तव नाम के एक यूजर ने शिवानंद तिवारी से ही पलटकर एक गंभीर सवाल किया है। उन्होंने पूछा है, “नीतीश जी आज की राजनीति में शीर्ष नेता हैं। क्या कोई सचमुच ईमानदार आदमी इस जगह पर जा सकता है? मैं आप से पूछता हूं।” यह सवाल राजनीति में ईमानदारी के स्तर पर एक व्यापक बहस छेड़ता है और यह सुझाव देता है कि शीर्ष राजनीतिक पदों पर पहुंचना अक्सर नैतिक मूल्यों या ईमानदारी से समझौता करने की कीमत पर ही संभव हो पाता है।
वहीं, नीरज सिंह नामक एक अन्य यूजर ने बिहार में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए लिखा है, “जितना भ्रष्टाचार आज है उसके लिए कौन दोषी है? बिहार में बहार है चारों और भ्रष्टाचार है।” यह टिप्पणी राज्य में व्याप्त भ्रष्टाचार की आम धारणा को दर्शाती है और इसे व्यवस्था की एक बड़ी और गहरी समस्या के रूप में प्रस्तुत करती है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर, शिवानंद तिवारी के इस सीधे और तीखे सवाल ने बिहार की राजनीति में सरकारी धन के उपयोग में पारदर्शिता और नेताओं की ईमानदारी पर एक नई और महत्वपूर्ण बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर अब जनता के सामने मुख्यमंत्री आवास पर हुए करोड़ों रुपये के खर्च का विस्तृत ब्योरा सार्वजनिक करने का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मुख्यमंत्री इस सवाल का क्या जवाब देते हैं और क्या यह मुद्दा आने वाले दिनों में और अधिक राजनीतिक तूल पकड़ता है, खासकर तब जब नीतीश कुमार उसी आवास में फिर से जा रहे हैं।





