सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 13 अप्रैल को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद नेता लालू प्रसाद यादव को बड़ा झटका दिया है। कोर्ट ने लैंड फॉर जॉब्स मामले में अपने और परिवार के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की जांच रद्द करने की उनकी याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। यह फैसला न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की बेंच ने सुनाया।
हालांकि, कोर्ट ने लालू प्रसाद यादव को इस मामले में कुछ राहत भी दी है। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए से जुड़े मुद्दे को ट्रायल के दौरान उठाने की अनुमति दी है। साथ ही, निचली अदालत को इस मामले पर गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करने को कहा गया है। कोर्ट ने लालू को सुनवाई के दौरान व्यक्तिगत रूप से पेश होने से भी छूट दी है। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, याचिकाकर्ता को मुकदमे के समय कानूनी मुद्दा उठाने की स्वतंत्रता दी जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस स्तर पर जांच में हस्तक्षेप करना उचित नहीं होगा। याचिकाकर्ता अपनी सभी कानूनी आपत्तियां ट्रायल कोर्ट के सामने उठा सकते हैं। बेंच ने अपने आदेश में यह भी साफ किया कि याचिकाकर्ता को पूर्व स्वीकृति (सैंक्शन) से जुड़े मुद्दे ट्रायल के दौरान उठाने की पूरी स्वतंत्रता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह के कानूनी प्रश्नों के लंबित रहने से मुकदमे की प्रक्रिया को रोका नहीं जा सकता है, यानी ट्रायल चलता रहेगा।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा मामला मुख्य रूप से भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के दायरे और इसके लागू होने के सवालों से जुड़ा है। इस धारा के तहत किसी भी सरकारी अधिकारी या लोक सेवक के आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान लिए गए निर्णयों की जांच शुरू करने से पहले सरकार या संबंधित प्राधिकरण से पूर्व अनुमति लेना आवश्यक होता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस धारा के दायरे और इसके पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू होने के सवालों को चिन्हित तो किया, लेकिन फिलहाल इन पर कोई विचार करने से परहेज किया। कोर्ट ने कहा कि इन गंभीर कानूनी सवालों पर आगे किसी उचित समय पर विचार किया जाएगा।
कपिल सिब्बल ने लालू यादव की ओर से पेश कीं दलीलें
सुनवाई के दौरान लालू यादव की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अपनी दलीलें रखीं। सिब्बल ने तर्क दिया कि बिना पूर्व स्वीकृति के की गई जांच ही अवैध है। उन्होंने दावा किया कि रेलवे में हुई नियुक्तियों को प्रभावित करने के आरोप लालू यादव के रेल मंत्री के रूप में किए गए आधिकारिक कार्यों से सीधे तौर पर जुड़े हुए हैं, जिससे उन्हें धारा 17ए के तहत संरक्षण प्राप्त होना चाहिए। सिब्बल ने इस बात पर जोर दिया कि सीबीआई ने जांच शुरू करने से पहले संबंधित अधिकारियों से आवश्यक अनुमति नहीं ली थी, जो कानून का उल्लंघन है।
वहीं, याचिका का विरोध करते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने तर्क दिया कि लालू यादव के मामले में पूर्व मंजूरी की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि वे कथित लेनदेन में न तो सीधे तौर पर निर्णय लेने वाले अधिकारी थे और न ही सिफारिश करने वाले अधिकारी। राजू ने आगे कहा कि सीबीआई जांच पूरी होने के काफी समय बाद यह याचिका दायर की गई है, जो इसकी मंशा पर सवाल उठाती है। उन्होंने बेंच से इस याचिका को खारिज करने का आग्रह किया।
हालांकि, बेंच ने सुनवाई के दौरान एक अहम टिप्पणी भी की। कोर्ट ने कहा कि औपचारिक या अनौपचारिक रूप से प्रभाव डालने से संबंधित प्रश्न मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही उठ सकते हैं। कोर्ट ने संकेत दिया कि ऐसे तथ्यात्मक और कानूनी मुद्दों का समाधान ट्रायल कोर्ट में ही बेहतर तरीके से किया जा सकता है और वहीं पर इनकी बेहतर तरीके से जांच भी होगी।
सोमवार का यह आदेश दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा लालू यादव की इसी तरह की याचिका खारिज करने के कुछ हफ्तों बाद आया है। हाईकोर्ट ने पहले कहा था कि 2018 में लागू की गई धारा 17ए, 2004 से 2009 के बीच किए गए कथित अपराधों पर पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं होती है। दिल्ली हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया था कि धारा 17ए के तहत संरक्षण लालू यादव को लागू नहीं होगा क्योंकि कथित कृत्य उनके कर्तव्यों के निर्वहन में की गई किसी भी आधिकारिक सिफारिश या निर्णय से संबंधित नहीं थे। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि कथित अपराध पद के दुरुपयोग और व्यक्तिगत लाभ से जुड़े थे, न कि आधिकारिक फैसले से।
क्या है लैंड फॉर जॉब्स मामला?
अब बात करते हैं लैंड फॉर जॉब्स मामले की। यह मामला साल 2004 से 2009 के बीच रेलवे में हुई भर्तियों में कथित धोखाधड़ी और अनियमितताओं से जुड़ा है। इस दौरान लालू यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री थे। आरोप है कि रेल मंत्री रहते हुए लालू प्रसाद यादव और उनके सहयोगियों ने भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य क्षेत्र, जबलपुर में ग्रुप डी की कई नियुक्तियां करने के बदले लोगों से उनकी कीमती जमीनें अपने परिवार के नाम लिखवा ली थीं। इस मामले का खुलासा होने के बाद केंद्रीय एजेंसियों ने जांच शुरू की और कई सबूत जमा किए।
इस मामले में इस साल जनवरी में लालू प्रसाद यादव, उनकी पत्नी राबड़ी देवी, बेटे तेजस्वी यादव और बेटी मीसा भारती समेत कुल 41 लोगों के खिलाफ आरोप तय कर दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद अब इस मामले में सीबीआई की जांच बिना किसी बाधा के जारी रहेगी और निचली अदालत में मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़ेगी। यह फैसला लालू यादव और उनके परिवार के लिए एक कानूनी चुनौती है।






