होली के त्योहार की तैयारियों के बीच, मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में एक अनूठी पहल देखने को मिल रही है। यहाँ स्वयं-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं रासायनिक रंगों का एक सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प पेश कर रही हैं। पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के मध्यप्रदेश डे-राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के तत्वावधान में दो दिवसीय ‘आजीविका होली मेला’ का आयोजन किया जा रहा है, जो इन महिलाओं के लिए आत्मनिर्भरता का मंच बन गया है।
इस मेले का मुख्य आकर्षण पलाश, गुलाब और गेंदा जैसे फूलों से बना हर्बल गुलाल है। ये रंग न केवल त्वचा के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं। इस पहल से स्थानीय महिलाओं को सीधे बाजार से जुड़ने और स्व-रोजगार का एक बेहतरीन अवसर मिला है।
कैसे तैयार होता है यह प्राकृतिक गुलाल?
इस हर्बल गुलाल को बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह से प्राकृतिक है। महिलाएं सबसे पहले फूलों की पंखुड़ियों को सावधानी से अलग करती हैं। इसके बाद, इन पंखुड़ियों को 2 से 3 दिनों तक सोलर ड्रायर में सुखाया जाता है ताकि उनकी नमी पूरी तरह खत्म हो जाए।
सूखने के बाद इन पंखुड़ियों को महीन पीसा जाता है, जिससे एक प्राकृतिक रंग का पाउडर तैयार होता है। इस पाउडर में चमक और मात्रा बढ़ाने के लिए चावल का आटा, मक्के का आटा और हल्दी जैसे प्राकृतिक तत्व मिलाए जाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में 4 से 5 दिन का समय लगता है और इसमें 8 से 10 महिलाएं मिलकर काम करती हैं।
आत्मनिर्भरता और बाजार तक सीधी पहुंच
यह मेला ‘वोकल फॉर लोकल’ की भावना को सशक्त कर रहा है। महिलाएं अपने हाथों से तैयार गुलाल को 100 ग्राम के पैकेट में 80 रुपये और 200 ग्राम के पैकेट में 150 रुपये में बेच रही हैं। इससे उन्हें न केवल आर्थिक मजबूती मिल रही है, बल्कि उनका आत्मविश्वास भी बढ़ रहा है।
मेले में हर्बल गुलाल के अलावा महिलाओं द्वारा बनाए गए अन्य उत्पाद भी बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। इनमें पापड़, अचार, विभिन्न पारंपरिक खाद्य उत्पाद और हस्तशिल्प की वस्तुएं शामिल हैं, जो स्थानीय कला और स्वाद को प्रदर्शित करती हैं। यह आयोजन महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की दिशा में एक संगठित और सफल प्रयास के रूप में सामने आया है।






