भारत की आर्थिक नीतियों और बजट के इतिहास में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सीमित रहा है, लेकिन उनका प्रभाव बेहद गहरा और महत्वपूर्ण माना जाता है। आजादी के बाद से अब तक केवल दो महिला वित्त मंत्रियों ने देश का केंद्रीय बजट पेश किया है — इंदिरा गांधी और निर्मला सीतारमण। दोनों के कार्यकाल न केवल अलग-अलग दशकों में आए, बल्कि देश की आर्थिक सोच के दो भिन्न युगों का भी प्रतिनिधित्व करते हैं।
इंदिरा गांधी: प्रधानमंत्री रहते हुए संभाला वित्त मंत्रालय
भारत की पहली महिला वित्त मंत्री होने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जाता है। उन्होंने प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए 1969 से 1971 के बीच वित्त मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार संभाला था। यह भारतीय इतिहास में पहला अवसर था जब किसी महिला ने संसद में केंद्रीय बजट प्रस्तुत किया।
उनका कार्यकाल उस दौर की मजबूत राजनीतिक और आर्थिक विचारधारा से प्रेरित था। इसी दौरान बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे बड़े और ऐतिहासिक फैसले लिए गए, जिसने देश की बैंकिंग और आर्थिक संरचना को हमेशा के लिए बदल दिया। उनका बजट तत्कालीन समाजवादी और सरकारी नियंत्रण वाली अर्थव्यवस्था का प्रतीक माना जाता है।
निर्मला सीतारमण: पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री
साल 2019 में निर्मला सीतारमण ने देश की पहली पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री के रूप में कार्यभार संभाला। उन्होंने 2020 में अपना पहला पूर्ण बजट पेश किया और तब से लगातार इस जिम्मेदारी को निभा रही हैं। उनका कार्यकाल कोविड महामारी, वैश्विक आर्थिक चुनौतियों और सुधारों के दौर से गुजरा है।
सीतारमण के कार्यकाल की एक बड़ी पहचान ‘पेपरलेस बजट’ की शुरुआत है। वर्ष 2021 से बजट को पारंपरिक ‘बही-खाते’ की जगह टैबलेट के जरिए डिजिटल रूप में पेश किया जाने लगा। उनके बजटों में इंफ्रास्ट्रक्चर, टैक्स सुधार, डिजिटल इकोनॉमी, स्टार्टअप्स और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर विशेष जोर दिया गया है। साल 2024 में अंतरिम बजट पेश करने के साथ ही वह लगातार सबसे ज्यादा बार बजट पेश करने वाली महिला वित्त मंत्री बन गई हैं।
दो दौर, दो अलग आर्थिक दिशाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों महिला वित्त मंत्रियों का योगदान केवल एक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि दो अलग-अलग आर्थिक दर्शनों का प्रतिबिंब है। इंदिरा गांधी का कार्यकाल जहां राज्य-नियंत्रित अर्थव्यवस्था और सरकारी हस्तक्षेप का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं निर्मला सीतारमण का कार्यकाल आर्थिक सुधार, निजीकरण को बढ़ावा और डिजिटल बदलावों पर केंद्रित है।
भले ही संख्या में यह योगदान छोटा लगे, लेकिन इन दोनों ही नेताओं ने अपने-अपने समय में देश की आर्थिक दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिसने भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक स्थायी छाप छोड़ी है।





