भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच आर्थिक संबंधों के एक नए युग की शुरुआत होने जा रही है। आज नई दिल्ली में फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) को लेकर एक महत्वपूर्ण समझौते का ऐलान हो सकता है। यूरोपीय संघ ने इस संभावित संधि को ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ करार दिया है। इस ऐतिहासिक वार्ता के लिए यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा भारत पहुंचे हैं, जहां वे केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के साथ उच्च स्तरीय चर्चा करेंगे।
इस FTA का मुख्य उद्देश्य भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक बाधाओं को न्यूनतम करना है। इसे व्यापार के लिए एक ‘टोल-फ्री’ रास्ते की तरह देखा जा रहा है, जिससे न केवल बड़े उद्योगों बल्कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) को भी वैश्विक मंच मिलेगा। इस समझौते के तहत भौगोलिक संकेत (GI) टैग वाले उत्पादों को विशेष सुरक्षा प्रदान की जाएगी, जिससे स्थानीय कारीगरों और उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय पहचान मजबूत होगी।
क्यों कहा जा रहा है इसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’?
यह समझौता वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकता है। यूरोपीय संघ वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा ट्रेड ब्लॉक है, जबकि भारत सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। दोनों के एक साथ आने से 200 करोड़ लोगों का एक विशाल साझा बाजार तैयार होगा। आंकड़ों के लिहाज से देखें तो यह डील दुनिया की कुल GDP के लगभग 25 प्रतिशत हिस्से को कवर करेगी।
“एक सफल भारत दुनिया को अधिक स्थिर, सुरक्षित और समृद्ध बनाता है। यह समझौता करीब दो अरब लोगों का साझा बाजार तैयार करेगा।” — उर्सुला वॉन डेर लेयेन, अध्यक्ष, यूरोपीय आयोग
वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जब दुनिया अमेरिका और चीन के विकल्प तलाश रही है, यह डील भारत को एक प्रमुख विनिर्माण केंद्र (Manufacturing Hub) के रूप में स्थापित कर सकती है। पिछले साल भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार 12.5 लाख करोड़ रुपये रहा था, जिसके इस समझौते के बाद दोगुना होने की प्रबल संभावना है।
भारतीय उद्योगों को मिलने वाले संभावित लाभ
इस समझौते से भारत के कई श्रम-प्रधान क्षेत्रों को सीधा फायदा पहुंचेगा। भारतीय कपड़े, जूते और चमड़ा उत्पादों पर वर्तमान में लगने वाली करीब 10 प्रतिशत ड्यूटी कम या पूरी तरह खत्म हो सकती है। इससे वैश्विक बाजार में भारतीय उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ेगी। इसके अलावा, फार्मा और केमिकल सेक्टर में दवाओं की मंजूरी की प्रक्रिया आसान होने से निर्यात में सालाना 20 से 30 प्रतिशत की वृद्धि की उम्मीद है।
रक्षा क्षेत्र में भी बड़ी प्रगति की उम्मीद है। फ्रांस और जर्मनी जैसे देश भारत में अपनी डिफेंस फैक्ट्रियां स्थापित कर सकते हैं, जिससे भारतीय रक्षा कंपनियों की पहुंच यूरोपीय संघ के डिफेंस फंड्स तक हो जाएगी। साथ ही, प्रस्तावित कार्बन टैक्स से राहत मिलने पर भारत के स्टील, एल्युमिनियम और हाइड्रोजन सेक्टर को बड़ी राहत मिल सकती है।
यूरोपीय उत्पादों के लिए खुलेंगे भारत के द्वार
यूरोपीय संघ लंबे समय से भारत में अपनी लग्जरी कारों और वाइन पर टैक्स कम करने की मांग कर रहा था। वर्तमान में भारत में प्रीमियम विदेशी कारों पर 110 प्रतिशत तक टैक्स लगता है, जिसे इस समझौते के तहत पहले चरण में 40 प्रतिशत और भविष्य में 10 प्रतिशत तक लाया जा सकता है। भारत सरकार 15,000 यूरो से अधिक कीमत वाली कुछ कारों पर तुरंत टैक्स कटौती के लिए सहमत हो गई है। इसके अलावा, यूरोप की IT, इंजीनियरिंग और टेलीकॉम कंपनियों को भारतीय बाजार में विस्तार के नए अवसर मिलेंगे।
चुनौतियां और 19 साल का लंबा इंतजार
भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापारिक वार्ता का सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। इसकी शुरुआत 2007 में हुई थी, लेकिन कृषि, डेयरी और टैक्स जैसे मुद्दों पर असहमति के कारण 2013 में बातचीत रुक गई थी। यूरोपीय संघ चाहता था कि भारत अपना डेयरी बाजार खोले, लेकिन भारत ने अपने किसानों के हितों की रक्षा के लिए इसे समझौते से बाहर रखने का फैसला किया है।
वर्तमान में 24 में से 20 अध्यायों पर सहमति बन चुकी है। हालांकि, कुछ चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। भारतीय कंपनियों को यूरोप के सख्त पर्यावरण और लेबर मानकों का पालन करना होगा, जिससे उनकी लागत बढ़ सकती है। वहीं, दवाइयों के पेटेंट नियम सख्त होने पर जरूरी दवाओं की कीमतों में बढ़ोतरी का डर भी बना हुआ है। 27 जनवरी को होने वाली 16वीं भारत-EU समिट में इस पर अंतिम मुहर लगने की संभावना जताई जा रही है।





