छत्तीसगढ़ की सियासत का केंद्र दुर्ग से सरगुजा की ओर क्यों खिसका, जोगी युग से अब तक कैसे बदले राजनीतिक समीकरण?

2003 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने संविधान के 91वें संशोधन के तहत मंत्रियों की संख्या को विधानसभा सदस्यों के 15% तक सीमित कर दिया। इसके चलते अजीत जोगी को अपनी कैबिनेट से पांच मंत्रियों को हटाना पड़ा।
छत्तीसगढ़ की सियासत का केंद्र दुर्ग से सरगुजा की ओर क्यों खिसका, जोगी युग से अब तक कैसे बदले राजनीतिक समीकरण?

छत्तीसगढ़ की राजनीति में क्षेत्रीय समीकरणों में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। पहले जहां कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार में दुर्ग संभाग सत्ता का केंद्र था, वहीं अब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार में सरगुजा संभाग नए शक्ति केंद्र के रूप में उभरा है। हाल के मंत्रिमंडल विस्तार में अंबिकापुर विधायक राजेश अग्रवाल के मंत्री बनने के बाद सरगुजा से कुल पांच मंत्री, जिसमें स्वयं मुख्यमंत्री शामिल हैं, सरकार में हैं। यह पहली बार है जब सरगुजा संभाग से इतनी बड़ी संख्या में मंत्री बने हैं, जो इसे सत्ता में निर्णायक भूमिका प्रदान करता है।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय (कुनकुरी), रामविचार नेताम (रामानुजगंज), श्यामबिहारी जायसवाल (मनेन्द्रगढ़), लक्ष्मी राजवाड़े (सूरजपुर) और अब राजेश अग्रवाल (अंबिकापुर) के साथ सरगुजा संभाग ने सत्ता में अपनी मजबूत पकड़ बनाई है। यह बदलाव आने वाले चुनावों में भाजपा की रणनीति में सरगुजा को मुख्य आधार बनाने का संकेत देता है। दूसरी ओर, भूपेश बघेल की कांग्रेस सरकार में दुर्ग संभाग छह मंत्रियों के साथ सत्ता का गढ़ था, जिसमें बघेल स्वयं (पाटन), मोहम्मद अकबर (कवर्धा), अनिला भेड़िया (डौंडीलोहारा), रविन्द्र चौबे (साजा), रुद्र गुरु (अहिवारा) और ताम्रध्वज साहू (दुर्ग ग्रामीण) शामिल थे। अब दुर्ग का प्रभाव कम हो गया है।

जोगी सरकार में था संतुलित मंत्रिमंडल

छत्तीसगढ़ के गठन के समय 2000 में अजीत जोगी की अगुवाई में कांग्रेस सरकार बनी थी, जिसमें 29 मंत्रियों का मंत्रिमंडल बनाया गया था। इस कैबिनेट में राजेंद्र प्रसाद शुक्ला, रामचंद्र सिंहदेव, महेंद्र कर्मा, भूपेश बघेल, मोहम्मद अकबर जैसे दिग्गज शामिल थे। गीतादेवी सिंह एकमात्र महिला मंत्री थीं। जोगी, जो उस समय विधायक नहीं थे, बाद में मारवाही से उपचुनाव जीता। उनकी सरकार में क्षेत्रीय और जातीय संतुलन बनाए रखने की कोशिश की गई थी, जिसमें हर तीसरे विधायक को औसतन मंत्री पद मिला था।

संवैधानिक बदलाव से मंत्रियों की संख्या सीमित

2003 में केंद्र की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने संविधान के 91वें संशोधन के तहत मंत्रियों की संख्या को विधानसभा सदस्यों के 15% तक सीमित कर दिया। इसके चलते अजीत जोगी को अपनी कैबिनेट से पांच मंत्रियों को हटाना पड़ा। इसी तरह, 2003 में बनी रमन सिंह की भाजपा सरकार में शुरू में 18 मंत्री शामिल थे, लेकिन छह महीने बाद संवैधानिक प्रावधान लागू होने पर पांच मंत्रियों को हटाना पड़ा। यह नियम छत्तीसगढ़ में वर्तमान में भी लागू है, जिसके तहत अधिकतम 13 मंत्रियों की नियुक्ति संभव है।

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