छत्तीसगढ़ की लोककला की सबसे बड़ी पहचान मानी जाने वाली पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। रायपुर स्थित एम्स अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने अंतिम सांस ली। 72 वर्ष की उम्र में उनके निधन की खबर से कला जगत, संगीत प्रेमियों और उनके प्रशंसकों में शोक की लहर दौड़ गई। तीजन बाई ने अपने जीवन का अधिकांश समय पंडवानी कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में लगाया और अपनी अलग शैली से इस लोककला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।
24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के गनियारी गांव में जन्मीं तीजन बाई का बचपन साधारण परिवार में बीता। उनके नाना ब्रजलाल पारधी महाभारत की कथाएं गाकर सुनाते थे। इन्हीं कहानियों ने बचपन में उनके मन में पंडवानी के प्रति गहरी रुचि पैदा की।
बाद में उन्होंने उमेद सिंह देशमुख से इस कला की बारीकियां सीखीं। महज 13 साल की उम्र में उन्होंने पहली सार्वजनिक प्रस्तुति दी और उसी समय से उनकी प्रतिभा लोगों का ध्यान खींचने लगी। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने कभी अपने सपने नहीं छोड़े और लगातार अपनी कला को निखारती रहीं।
पंडवानी गायिका तीजन बाई ने बदली परंपरा
तीजन बाई ने उस दौर में परंपराओं को चुनौती दी, जब महिलाएं केवल बैठकर ‘वेदमती शैली’ में पंडवानी प्रस्तुत करती थीं। उन्होंने पुरुष कलाकारों की ‘कापालिक शैली’ अपनाई और मंच पर खड़े होकर पूरे आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुति देना शुरू किया। उनकी दमदार आवाज, अभिनय, चेहरे के भाव और संवाद शैली ने पंडवानी को सिर्फ गायन नहीं, बल्कि जीवंत मंचीय प्रस्तुति बना दिया।
प्रसिद्ध रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें बड़े मंचों तक पहुंचाया। इसके बाद उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सहित कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय हस्तियों के सामने प्रस्तुति दी। इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी, तुर्की, मॉरीशस समेत 17 से अधिक देशों में उन्होंने भारतीय लोक संस्कृति का परचम लहराया। उनकी वजह से पंडवानी को वैश्विक स्तर पर नई पहचान मिली और नई पीढ़ी भी इस लोककला की ओर आकर्षित हुई।
पद्म विभूषण से सम्मानित तीजन बाई
लोककला में उनके असाधारण योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले। वर्ष 1988 में उन्हें पद्मश्री, 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 2003 में पद्म भूषण और 2019 में देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान पद्म विभूषण प्रदान किया गया। वर्ष 2018 में उन्हें जापान का प्रतिष्ठित फुकुओका पुरस्कार भी मिला।
बिलासपुर विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट. की मानद उपाधि से भी सम्मानित किया था। जीवन के अंतिम वर्षों में वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थीं। बड़े बेटे के निधन के बाद उनकी तबीयत लगातार बिगड़ती चली गई। वर्ष 2024 में उन्हें लकवा भी हुआ, जिसके बाद वह लंबे समय तक बिस्तर पर रहीं। हाल ही में फेफड़ों में पानी भरने, निमोनिया और लो ब्लड प्रेशर की शिकायत के बाद उन्हें रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां इलाज के दौरान उनका निधन हो गया।
तीजन बाई भले ही इस दुनिया से विदा हो गई हों, लेकिन उनकी आवाज, उनकी शैली और भारतीय लोक संस्कृति को दिया गया उनका योगदान हमेशा याद रखा जाएगा। आने वाली पीढ़ियों के लिए वह संघर्ष, प्रतिभा और समर्पण की ऐसी मिसाल हैं, जिसने यह साबित किया कि सच्ची कला किसी भी सीमा की मोहताज नहीं होती।






