डबरा: उम्र के इस पड़ाव पर जब कदम लड़खड़ाने लगें तो किसी अपने का हाथ सबसे बड़ी ताकत होता है। लेकिन हर किसी के हिस्से में यह साथ नहीं आता। डबरा की सड़क पर लाचार हालत में भटक रही एक बुजुर्ग माताजी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। न साथ में कोई अपना था, न सिर पर छत और न यह पता कि अगला ठिकाना कहां होगा।
राह चलते शायद कई लोगों की नजर उन पर पड़ी होगी, लेकिन गोविंद गुप्ता ने उन्हें देखकर नजरें नहीं फेरीं। उन्होंने ‘अपना घर आश्रम’ की टीम को सूचना दी। टीम मौके पर पहुंची और बुजुर्ग महिला को रेस्क्यू कर आश्रम ले आई।
यहां सबसे पहले उनके स्वास्थ्य और जरूरी देखभाल की व्यवस्था की गई। उन्हें नहलाया गया, साफ कपड़े पहनाए गए और भोजन कराया गया। इन जरूरतों के साथ उन्हें वह एहसास भी मिला, जिसकी शायद उस वक्त सबसे ज्यादा जरूरत थी-अब वे अकेली नहीं हैं।
एक घटना, लेकिन सवाल पूरे समाज से
जिस उम्र में मां-बाप को अपने बच्चों और परिवार की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, उस उम्र में किसी बुजुर्ग का सड़क पर इस हालत में मिलना केवल एक घटना भर नहीं है। यह समाज के सामने भी सवाल छोड़ता है कि जिंदगी भर दूसरों को संभालने वाले हाथ आखिर उम्र के आखिरी पड़ाव पर अकेले कैसे छूट जाते हैं? इस माताजी को अब सुरक्षित ठिकाना मिल गया है, लेकिन ऐसी परिस्थितियों से गुजरने वाली वे अकेली नहीं हैं।
अपना घर आश्रम में रह रहे करीब 125 ‘प्रभुजी’
डबरा का अपना घर आश्रम ऐसे ही जरूरतमंद लोगों की देखभाल कर रहा है। यहां आश्रय लेने वालों को ‘प्रभुजी’ कहकर संबोधित किया जाता है। दतिया, भिंड, मुरैना, ग्वालियर सहित आसपास के क्षेत्रों से भी जरूरतमंदों को रेस्क्यू कर यहां लाया जाता है। वर्तमान में करीब 125 प्रभुजी यहां रह रहे हैं। उनके भोजन, रहने और स्वास्थ्य जैसी जरूरतों का ध्यान रखने के साथ उन्हें सम्मान के साथ जीवन जीने का माहौल देने का प्रयास किया जाता है।
रिश्तों की एक अलग परिभाषा
आश्रम के संस्थापक मनीष पांडे और उनकी टीम ऐसे लोगों की सेवा में जुटी है, जिनके मुश्किल वक्त में कई बार कोई अपना साथ नहीं होता। शायद इसीलिए यहां रिश्तों की परिभाषा भी थोड़ी अलग दिखाई देती है- रिश्ते केवल खून से नहीं, किसी अनजान के लिए रुक जाने और उसका हाथ थाम लेने से भी बनते हैं।
गोविंद गुप्ता ने भी यही किया। उन्होंने कोई बड़ा दावा नहीं किया, बस सड़क पर मिली एक बुजुर्ग महिला को देखकर सही जगह सूचना पहुंचाई। बाकी जिम्मेदारी आश्रम की टीम ने संभाल ली। यह घटना एक छोटी-सी बात याद दिलाती है- हर मदद के लिए बड़ा साधन जरूरी नहीं होता। कभी-कभी किसी अनजान के लिए रुक जाना ही काफी होता है।





