दमोह की विशेष अदालत ने रिश्वत लेने के मामले में तत्कालीन राजस्व निरीक्षक मनीराम गोंड को चार साल की सश्रम कैद और 4 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई है। दरअसल आरोपी को वर्ष 2022 में लोकायुक्त सागर की टीम ने पांच हजार रुपये की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों गिरफ्तार किया था। यह मामला उस समय सामने आया था जब दमोह निवासी पंकज जैन ने अपनी जमीन के सीमांकन के लिए राजस्व विभाग में आवेदन दिया था।
वहीं आरोप है कि प्रक्रिया पूरी करने के बदले तत्कालीन राजस्व निरीक्षक मनीराम गोंड ने पांच हजार रुपये की रिश्वत मांगी। शिकायत मिलने के बाद लोकायुक्त सागर ने प्राथमिक जांच की और आरोप सही पाए जाने पर ट्रैप की योजना बनाई। तय योजना के अनुसार 21 मार्च 2022 को आरोपी को रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया गया। इसके बाद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज कर अदालत में चालान पेश किया गया।
लोकायुक्त ट्रैप केस में अदालत ने क्या कहा?
दरअसल करीब चार साल तक चले इस मुकदमे में अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्य, ट्रैप कार्रवाई से जुड़े प्रमाण और गवाहों के बयान अदालत के सामने पेश किए। सभी तथ्यों पर सुनवाई के बाद विशेष न्यायाधीश भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, दमोह ने मनीराम गोंड को दोषी करार दिया। अदालत ने उन्हें चार वर्ष के सश्रम कारावास के साथ 4 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई। अभियोजन पक्ष का कहना था कि आरोपी ने सरकारी पद का दुरुपयोग करते हुए रिश्वत की मांग की थी, जिसे ट्रैप कार्रवाई के दौरान प्रमाणित किया गया। जिला न्यायालय के अधिकारियों के अनुसार, यह फैसला सरकारी कर्मचारियों के लिए स्पष्ट संदेश है कि रिश्वतखोरी के मामलों में अदालतें उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर सख्त कार्रवाई कर रही हैं। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों की भूमिका भी बेहद अहम होती है, क्योंकि ट्रैप कार्रवाई के दौरान जुटाए गए सबूत अदालत में महत्वपूर्ण आधार बनते हैं।
मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार पर बढ़ी सख्ती?
वहीं पिछले कुछ वर्षों में मध्य प्रदेश में लोकायुक्त और आर्थिक अपराध जांच एजेंसियों की कार्रवाई लगातार तेज हुई है। राजस्व, नगरीय प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य विभागों में रिश्वतखोरी की शिकायतों पर ट्रैप कार्रवाई के कई मामले सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में समय पर जांच और अदालतों से दोषियों को सजा मिलने से सरकारी व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ती है। इससे आम नागरिकों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा भी मजबूत होता है।
दरअसल दमोह का यह फैसला भी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक पद पर रहते हुए रिश्वत लेना गंभीर अपराध है और ऐसे मामलों में कानून के तहत सख्त सजा दी जा सकती है।






