दमोह जिले के छोटे से गांव बकायन में एक बार फिर शास्त्रीय संगीत की मधुर स्वर लहरियां गूंज उठीं। दो दिनों तक चले 132वें नाना साहब पानसे स्मृति संगीत समारोह का भव्य समापन हुआ। इस ऐतिहासिक आयोजन में देश के अलग-अलग राज्यों से आए प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक, वादक और नृत्य कलाकारों ने अपनी कला का प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने उत्साह के साथ भाग लिया और देर रात तक कलाकारों की प्रस्तुतियों का आनंद लिया।
यह समारोह केवल संगीत का मंच नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय संस्कृति और शास्त्रीय संगीत की विरासत को आगे बढ़ाने का एक जीवंत उदाहरण भी है। करीब 132 वर्षों से लगातार आयोजित हो रहा यह कार्यक्रम आज भी अपनी परंपरा, अनुशासन और सांस्कृतिक गरिमा के कारण देशभर में खास पहचान बनाए हुए है।
बकायन गांव में 132 साल पुरानी परंपरा आज भी जीवित
नाना साहब पानसे स्मृति संगीत समारोह की शुरुआत करीब 132 वर्ष पहले पलनीटकर परिवार ने अपने गुरु, महान मृदंगाचार्य नाना साहब पानसे की स्मृति में की थी। तभी से हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर इस आयोजन की परंपरा बिना रुके जारी है।
समय के साथ कार्यक्रम का स्वरूप और बड़ा हुआ, लेकिन इसकी मूल भावना आज भी वही है गुरु के प्रति सम्मान, संगीत के प्रति समर्पण और भारतीय संस्कृति का संरक्षण। यही कारण है कि इसे देश के सबसे पुराने शास्त्रीय संगीत समारोहों में गिना जाता है।
संस्कृति मंत्रालय और उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत अकादमी का सहयोग
इस वर्ष आयोजित समारोह को भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय, मध्य प्रदेश संस्कृति विभाग और उस्ताद अलाउद्दीन खां संगीत एवं कला अकादमी का सहयोग मिला।
दो दिनों तक चले इस आयोजन में शास्त्रीय गायन, संतूर वादन, तबला, मृदंग, कथक और अन्य भारतीय शास्त्रीय कलाओं की शानदार प्रस्तुतियां दी गईं। मंच पर कलाकारों ने अपनी कला से ऐसा वातावरण बनाया कि पूरा गांव संगीतमय हो गया।
मंत्री लखन पटेल ने कहा- गुरु के प्रति ऐसी श्रद्धा दुर्लभ है
समापन समारोह में मध्य प्रदेश सरकार के आनंद विभाग के मंत्री लखन पटेल मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि वह पिछले कई दशकों से इस आयोजन में आते रहे हैं। उनके अनुसार, आज के समय में भी किसी गांव में इतनी मजबूती से गुरु-शिष्य परंपरा का निभाया जाना अपने आप में बड़ी बात है।
उन्होंने कहा कि यह आयोजन केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और संगीत से जोड़ने का माध्यम भी है। ऐसे आयोजनों को आगे बढ़ाने के लिए सभी को मिलकर प्रयास करना चाहिए।
कलाकार बोले
समारोह में पुणे, लखनऊ, दिल्ली सहित देश के कई शहरों से आए कलाकारों ने अपनी प्रस्तुतियों से दर्शकों का मन मोह लिया। प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक पंडित रघुनंदन पड़शीकर ने कहा कि उन्होंने देश-विदेश के कई मंचों पर प्रस्तुति दी है, लेकिन किसी ग्रामीण क्षेत्र में शास्त्रीय संगीत के प्रति इतना गहरा लगाव बहुत कम देखने को मिलता है।
कथक नृत्यांगना वर्षा मिश्रा ने कहा कि गांव के लोगों का संगीत के प्रति सम्मान और धैर्य उन्हें बेहद प्रभावित कर गया। उन्होंने बताया कि यहां के दर्शक केवल कार्यक्रम देखने नहीं आते, बल्कि संगीत को समझते और महसूस भी करते हैं। दिल्ली से आए संतूर वादक डॉ. विपुल कुमार रॉय ने भी कहा कि बकायन का यह मंच कलाकारों के लिए खास अनुभव देता है। यहां प्रस्तुति देना किसी सम्मान से कम नहीं है।
शास्त्रीय संगीत के साथ गुरु-शिष्य परंपरा का अनोखा संगम
इस आयोजन की सबसे बड़ी खासियत इसकी गुरु-शिष्य परंपरा है। हर साल यह समारोह केवल संगीत प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि गुरु के प्रति सम्मान और भारतीय संस्कारों का संदेश भी देता है। यही वजह है कि कई कलाकार हर वर्ष यहां आने की इच्छा रखते हैं। कार्यक्रम में युवा कलाकारों को भी मंच दिया गया, ताकि वे वरिष्ठ कलाकारों से सीख सकें और भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा आगे बढ़ा सकें।
ग्रामीणों ने बढ़ाया कलाकारों का उत्साह
कार्यक्रम में आसपास के गांवों के अलावा दूर-दराज के क्षेत्रों से भी लोग पहुंचे। देर रात तक बड़ी संख्या में लोग पूरे अनुशासन के साथ कलाकारों की प्रस्तुतियां सुनते रहे। ग्रामीणों ने कलाकारों का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया। यही आत्मीयता इस आयोजन को दूसरे संगीत समारोहों से अलग बनाती है।
कई कलाकारों ने कहा कि शहरों के बड़े सभागारों में प्रस्तुति देना अलग अनुभव होता है, लेकिन गांव के बीच बैठकर संगीत सुनने वाले लोगों का अपनापन उन्हें हमेशा याद रहेगा।






